कोरोना, ज्योतिमर्य और धर्म ज्ञान


पिछले कुछ समय से जिस तेजी से मेरे परिचितो ने दुनिया छोड़ी है उसे देखकर मैं घबरा गया हूं और मैंने तय किया था कि अब निकट भविष्य में इस दुनिया को छोड़ कर जाने वाले किसी परिचित के बारे में अपनी पुरानी यादों को इस कॉलम में ताजा नहीं करूंगा। मगर तभी अपने पुराने परिचित ज्योतिर्मय के अचानक दुनिया छोड़कर चले जाने की खबर आ गई और ना चाहते हुए भी मुझे उनके बारे में कुछ लिखना पड़ रहा है। मैं उन्हें दशको से तब से जानता था जब वे पहली बार नौकरी की तलाश में दिल्ली आए थे। उस समस वे हरिद्वार स्थित गायत्री परिवार की पत्रिका अखंड ज्योति में काम करते थे।

उसमें काम क्या करना उसके सारे लेख वहीं लिखते थे। जो ज्योतिमर्य के धर्म, आधुनिक जानकारी और विकास पर आधारित तर्क से हुआ करते थे। जब हमारा पहली बार परिचय हुआ तो उन्होंने मेरा नाम सुनते ही कहा कि मेरे बेटे का नाम भी विवेक है। वे कहते थे कि उनका बेटा विवेक तो आधुनिक श्रवण कुमार है। उन्होंने अपना नाम रमेश भटनागर ज्योतिर्मय बताया। उन्हें ज्योतिर्मय नाम गुरूजी ने दिया था। वे उनके साथ 16 साल की छोटी सी उम्र में हरिद्वार आ गए थे। वे गुरूजी पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य शांतिकुज से तब मिले थे जब गुरूजी मालवा गए थे। उन्होंने उनसे दीक्षा ली थी व उनकी प्रतिभा को भांपते हुए गुरूजी उन्हें अपने साथ हरिद्वार ले आए थे।

मुझे याद है कि ज्योतिर्मय तो सादा जीवन उच्च विचार का जीता जागता नमूना थे। जब वे इंटरव्यू के लिए दिल्ली प्रेस आए तो पाजामा व कुर्ता पहन कर आए थे। उनका चयन करते हुए संपादकजी ने उनसे कहा कि अब तुम दिल्ली आ रहे हो तो तुम्हारी यह ड्रेस नहीं चलेगी। मैं तुम्हें कुछ पैसे एडवांस में दिलवा देता हूं तुम कल बाजार जाकर दो जोड़ी पैंट व कमीज खरीद लेना।

मेरी मां गायत्री परिवार को बहुत मानती थी। जब मैंने घर जाकर उन्हें बताया कि अखंड ज्योति के लेखक ज्योतिर्मय अब मेरे साथ काम करने दिल्ली आ गए हैं तो वे काफी खुश हुई। दोपहर में हम लोग अक्सर समोसा खाने व चाय पीने के लिए दिल्ली प्रेस के पास ही किसी एक दुकान पर जाते थे। एकाध लगुए मगुए भी साथ होते थे। कभी मैं समोसे के पैसे देता तो ज्योतिर्मय चाय के पैसे अदा करते। मगर वे लगुए मगुए कभी एक भी पैसा नहीं देते थे। आज जब किसी चैनल पर इन लगुए मगुए लोगों को ज्ञान बधारते देखता हूं तो उन दिनो की याद आ जाती है।

अखंड ज्योति जानी-मानी धार्मिक पत्रिका थी जबकि दिल्ली प्रेस अपनी धर्म विरोधी पहचान के लिए जाना जाता था। उसकी जानी-मानी पारिवारिक पत्रिका सरिता के पहले पृष्ठ पर लिखा होता था कि हिंदुओ द्वारा सबसे ज्यादा पढ़ी व उन्हें सबसे ज्यादा क्षुब्ध करने वाली पत्रिका। ज्योतिर्मय पहले अखंड ज्योति में धर्म के पक्ष में लिखते थे व दिल्ली प्रेस आकर यहां की पत्रिकाओं में दलीले देकर धर्म के खिलाफ लिखने लगे। एक बार तत्कालीन संपादक परेशनाथ ने उन्हें धर्म के मुद्दे पर शास्त्रार्थ बहस करने के लिए शंकराचार्यजी के पास भेजा और इस शास्त्रार्थ में शंकराचार्य को उन्होंने हरा दिया। इस पर दोनों के बीच हुई बातचीत की कवर स्टोरी छपी। वह गजब का समय था।

इस घटना के बाद मेरे मन में उनके लिए सम्मान बहुत ज्यादा बढ़ गया। उन्होंने दिल्ली प्रेस में कई वर्षा तक काम किया। मेरे सहयोगी फोटोग्राफर व मित्र सुभाष भारद्वाज ने मुझे बताया कि एक बार उन्हें ज्योतिर्मय के साथ किसी धार्मिक नेता के फोटो खींचने के लिए जाना था। वे जब उन्हें साथ लेने के लिए उनके घर गए तो पता चला कि वे पूजा कर रहे थे। जब वे पूजा करके उनसे मिलने आए तो सुभाष ने उनसे पूछा कि भाईसाहब वैसे तो आप धर्म के खिलाफ इतना ज्यादा लिखते हैं वही आप इतनी लंबी पूजा करते हैं यह कैसा विरोधाभास है। इस पर वे मुस्कुराकर कहने लगे कोई विरोधाभास नहीं है। धर्म के खिलाफ लिखना मेरी रोजी रोटी व पूजा पाठ करना मेरा नित्य कर्म है। दोनों मेरे लिए अलग-अलग है।

वे कायस्थ होने के बावजूद न तो मांस मछली खाते थे और न हीं शराब पीते थे। वे तो पंडितो और ब्राह्मणों को भी मात करते थे। एक बार उन्होंने मुझे हरिद्वार स्थित आश्रम में एक बहुत अच्छा किस्सा बताया जिसे कि मैं आज तक नहीं भूला। उन्होंने बताया कि आश्रम में रहने वाला एक व्यक्ति सबकी चुगली और बुराई करता था। एक बार उन्होंने गुरूजी को यह बात बताई तो गुरूजी ने उनसे कहा कि एक बात याद रखना कि हर जगह एक जैसे लोग नहीं होते। याद रखना कि 40 फीसदी अंक आने पर विश्वविद्यालय भी डिग्री थमा देते हैं। इसलिए अपने जीवन में हमें 40 फीसदी योग्यता वाले लोग भी मिल जाए तो खुद को भाग्यशाली समझना। शत प्रतिशत सही होने वाले लोग बिरलो को ही मिलते होंगे। मैंने अपने जीवन में उनकी इस बात को दिल के अंदर गहराई में उतार लिया।

ज्योतिर्मय बहुत ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे मगर उनमें धार्मिक ज्ञान व समझ गजब की थी। उनके पिता की बचपन में ही मृत्यु हो गई थी। उन्होंने बचपन से ही छोटी मोटी नौकरियो से लेकर मजदूरी तक करके अपने भाई बहनो का पेट भरा। वे हरिद्वार व दिल्ली से हर महीने अपने परिवार को पैसा भेजते थे। उन्होंने अपने आधा दर्जन भाई बहनो की शादी की। बाद में उन्होंने दिल्ली प्रेस की नौकरी छोड़ दी। दिल्ली प्रेस के लोगों पर नजर रखने वाले व्यासजी के कारण ज्योतिमर्य भी श्रीशमिश्र, मुझे, अतुल जैन, प्रदीपश्रीवास्तव जनसत्ता में आ टिके। वे धर्म के बारे में लिखने लगे। फिर उन्होंने कुछ जाने-माने संस्थानों में नौकरी की। वे मरने के कुछ दिन पहले तक दोनों समय पूजा पाठ करते रहे। लगता है कि ईश्वर उन्हें बहुत प्यार करता था क्योंकि उन्होंने मरने के पहले न तो अपने परिवार के लिए कोई समस्या पैदा की और न ही खुद परेशान हुए और ना ही परिवार के सदस्यो को परेशान किया।

बीमार होने के तीसरे दिन उनकी मृत्यु हो गई। जिस दिन उनकी मृत्यु हुई वह मोक्ष एकादशी का दिन था। लगता था कि जैसे उन्होंने दुनिया से विदा लेने का दिन व समय खुद ही चुना था। फोन पर मेरी उनसे अक्सर बातचीत हुआ करती थी और मैं उन्हें अपने दिल की बात बताते हुए धर्म से लेकर मन के पलो वाली गलतफहमियो को दूर किया करता था। एक बार अपनी मां की मृत्यु के बाद उनकी इच्छानुसार गायत्री पीठ हरिद्वार गया था। वहां की कर्ता-धर्ता माताजी तब जीवित थी। उनके स्टाफ ने मुझे कहा कि अब उनके आराम करने का समय है वे मुझसे नहीं मिल सकती। इस पर मैंने उसे अपना जनसत्ता का कार्ड थमाते हुए कहा कि यह कार्ड माताजी को देकर कहना कि एक पत्रकार उनसे मिलने आया है।

वह कुछ क्षणों बाद मुस्कुराता हुआ आया और मुझे अपने साथ उनके ड्राइंग रूम में ले गया। कुछ देर बाद माताजी आई मैंने उनके पैर छुए व मेरे लिए चाय नाश्ता मंगवाया गया। मैं इस घटना से बहुत दुखी हुआ मुझे लगा कि इतनी तथाकथित महान महिला ने भक्त पुत्र को नहीं बल्कि एक पत्रकार को अहमियत दी। मैंने जब यह बात ज्योतिर्मयजी को बताई तो वे मुस्कुरा कर कहने लगे कि इसी को सांसारिकता कहते हैं। मेरी समझ में यह भी आ गया कि उन्होंने तभी अपना कैरियर बनाने के लिए हरिद्वार छोड़कर दिल्ली का रास्ता पकड़ा होगा।

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