सरकार पर अदालत भारी ?









सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के सिर पर एक चपत लगा दी है। उसने नए संसद भवन के निर्माण पर फिलहाल रोक लगा दी है। 10 दिसंबर को उसके लिए आयोजित भूमि-पूजन को उसने नहीं रोका है लेकिन नए संसद के निर्माण के लिए कई भवनों को गिराने, पेड़ों को हटाने और सारे क्षेत्रीय नक्शे को बदलने पर रोक लगा दी है। 10 दिसंबर को इस महत्वाकांक्षी योजना को अमल में लाने के लिए प्रधानमंत्री भूमि-पूजन कर रहे हैं। इस पूरे निर्माण-कार्य पर लगभग 20 हजार करोड़ रु. खर्च होंगे और इसे अगले दो साल में पूरा करने का विचार है। नए संसद भवन के दोनों सदनों में लगभग 1500 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था होगी। अभी इस क्षेत्र में 39 मंत्रालय सिर्फ 17 भवनों में चल रहे हैं।

नए निर्माण-कार्य में ऐसे दस विशाल भवन बनाए जाएंगे, जिनमें 51 मंत्रालय एक साथ चल सकेंगे। अभी सरकार को किराए के कुछ भवन लेने पड़ते हैं। उन पर एक हजार करोड़ रु. सालाना खर्च होता है। अंग्रेज के बनाए ये सभी भवन अब 100 बरस पुराने पड़ गए हैं। नए भव्य भवनों को बनाने का संकल्प मोदी सरकार ने अभी जरुरतों को ध्यान में रखते हुए लिया है लेकिन इस संकल्प के खिलाफ लगभग 1200 आपत्तियां उठाई गई हैं। सर्वोच्च न्यायालय सहित कई अदालतों में विभिन्न लोगों ने याचिकाएं दायर की हैं।उनमें कई आरोप है, जैसे पेड़ गिराने की अनुमति पर्यावरण-नियमों के विरुद्ध दी गई है और जमीन के इस्तेमाल की इज़ाजत गलत तरीके से ली गई है। सरकार ने यह इजाजत देने में अपने ही कई नियमों का उल्लंघन किया है। सर्वोच्च न्यायालय इस बात पर नाराज हुआ कि उसने सरकार से इन सब आपत्तियों पर सफाई मांगी लेकिन वह दिए बिना उसने 10 दिसंबर को भूमि-पूजन की घोषणा कर दी।

इस भूमि-पूजन पर भी हमारे कई सेक्युलरिस्ट नेताओं ने आपत्ति की है। उनका कहना है कि क्या यह हिंदू मंदिर है ? यह भारत-भवन है। इसमें सभी धर्मों से शुभारंभ होना चाहिए। अदालत के वर्तमान रवैए से यह शंका पैदा होती है कि शायद इसकी अनुमति न मिले। अभी तो उसका तेवर यही है लेकिन सामान्य-बोध कहता है कि सरकार के इस संकल्प पर अदालत का फैसला आखिरकार भारी नहीं पड़ेगा।

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