रोशनी कानून का अंधेर

 


मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि हमारे देश में लोग कोई गलत काम होने के बाद लोग उसके खुलासे से डरते नहीं हैं। बल्कि उस कांड से निपटने के लिए सख्त कानून बनाने के बावजूद वैसे ही अपराध करने के लिए प्रेरित होते रहे हैं। जरा याद कीजिए कि जब देश निर्भया कांड की दरिंदगी के कारण हिल गया था व तत्कालीन सरकार ने दोषी को सजा देने व भविष्य में लोगों को निरूत्साहित करने के लिए जो कानूनी परिवर्तन किए थे, उसके बाद भी देश जस का तस है। जब देश में बोफोर्स भ्रष्टाचार कांड का खुलासा हुआ तब से आज तक रक्षा साज-सामान की विदेशों से खरीद को लेकर जस के तस विवाद है।

तब मानों बोफोर्स शब्द एक विशेषण बन गया था व वह कमीशन और दलाली के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा था। आपसी बातचीत में लोग यह पूछने लगे थे कि इस धंधे में कितना बोफोर्स (दलाली) है। फिर जब जगमोहन जम्मू कश्मीर के राज्यपाल पद से हटे तो उन्होंने वहां नेताओं खासतौर से सत्तारूढ़ दल के लोगों द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार पर खुलासा अपनी किताब दहकते अंगारे में किया। मगर पिछले साल केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 खत्म किए किए जाने के बाद भी वहां लोगों द्वारा सरकारी जमीन हथियाने का सिलसिला कैसे जारी रहा, इसका खुलासा हाल में राज्य में हाईकोर्ट द्वारा विवादास्पद रोशनी एक्ट को गैरकानूनी घोषित कर समाप्त कर देने का है।

इस मामले में हर सत्तारूढ़ दल के लोगों ने सरकारी जमीन की बंदर-बांट की थी। नेता कैसे एक तीर से कई शिकार करते हैं इसका जीता जागता उदाहरण राज्य का रोशनी एक्ट है। फारूख अब्दुल्ला की सरकार ने 2001 में राज्य की सरकारी जमीन पर कब्जा कर चुके लोगों को उसका मलिकाना अधिकार देने व राज्य में कुछ बिजली परियोजनाओं के लिए पैसा जुटाने के लिए रोशनी एक्ट की शुरुआत की।

तब सरकार ने दावा किया कि उन्हें कब्जा देने के बदले में जो पैसा जारी किया जाएगा उसका इस्तेमाल राज्य में बिजली परियोजना शुरू करने पर किया जाता। कानून बनते ही शक्तिशाली सत्ताधारी हरकत में आ गए व उन्होंने सरकारी जमीनो पर अवैध  कब्जा करके उसका मालिकाना हक हासिल करने के लिए कार्रवाई शुरू कर दी।

इनमें आला नेता, अफसर व राज्य के प्रभावशाली लोग शामिल थे। जम्मू कश्मीर का सबसे बड़ा जमीन घोटाला कहे जाने वाले इस कांड में राज्य सरकार को करीब 25000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। बताते हैं नियंत्रक एवं महालेखाकार ने 2014 में अपनी रिपोर्ट में इस घोटाले व अनियमिततओं को जिक्र किया व 2015 में राज्य के सतर्कता आयोग ने राज्य के 20 सरकारी अफसरो पर इस कानून का दुरुपयेाग करने के आरोप लगाए। मगर किसी भी अफसर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।

जब सतपाल मलिक 2018 में राज्य के राज्यपाल बने तो उन्होंने इस कानून को समाप्त करने के साथ ही इस घोटाले की जांच सीबीआई द्वारा किए जाने के आदेश जारी किए। इस घोटाले को अक्टूबर 2020 में एकजुट जम्मू समिति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी व हाईकोर्ट ने सभी रोशनी कानूनो का अवैध घोषित कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि गुलाम नबी आजाद द्वारा 2007 में बनाए गए रोशनी के नियमों की कोई संवैधानिक वैधता नहीं थी। न ही उसे विधानसभा की सहमति हासिल थी।

इस पर राज्य सरकार ने कहा कि वह इस योजना का लाभ उठाने वालो के नाम सार्वजनिक करने के बाद उनसे जमीन वापस ले लेगी। इसके बाद 22 अक्टूबर 2020 को जम्मू कश्मीर के प्रशासन ने इस योजना के तहत जमीन हासिल करने वाले मंत्रियो, विधायको, अफसरो, पुलिस अफसरो, सरकारी कर्मचारियों, व्यापारियों, प्रभावशाली लोगों व उनके रिश्तेदारो का विवरण तैयार किया। दो दिन बाद ही केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने प्रेस कांफ्रेंस में यह खुलासा किया कि रोशनी कानून के तहत जमीन हासिल करने वालो में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री डा फारूख अब्दुल्ला भी शामिल हैं।

लाभार्थियो की सूची में राज्य के पूर्व वित्त मंत्री हसीब द्राबू, कांग्रेसी नेता मजिदवानी, नेशनल कांफ्रेंस के नेता व पूर्व गृहमंत्री सज्जाद किचलू व जम्मू कश्मीर बैंक के अध्यक्ष एमवाई खान भी शामिल रहे हैं। कांग्रेसी नेता व पूर्व मुख्यमंत्री गुलामनबी आजाद का नाम भी लाभार्थियो की सूची में पाया गया। राज्य के हाईकोर्ट ने अतिक्रमण कर अवैध रूप से जमीन कब्जाने वाले सभी लोगों से यह जमीन वापस लेने के आदेश दिए हैं। इस कांड की गंभीरता का अंदाजा तो इस बात से ही लगाया जा सकता है कि जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस राकेश बिंदल की खंडपीठ ने सीबीआई के निदेशक से इस मामले की जांच कम से कम एसपी रैंक के अधिकारी से करवाए जाने के आदेश दिए।

जब 2001 में डा फारूख अब्दुल्ला ने यह कानून लागू किया तब सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने वाले को मलिकाना हक देने के लिए 1990 को कट ऑफ वर्ष निर्धारित किया था। उसके बाद तो हर सरकार ने इस कट ऑफ साल को बढ़ाना शुरू कर दिया। लोगों को फायदा पहुंचने के लिए मुफ्ती मोहम्मद सईद ने 2004 में व गुलाम नबी आजाद की सरकार ने 2007 में कानून में संशोधन किए। पहले सरकार ने 20.46 लाख कनाल जमीन लोगों को सौंपकर 25000 करोड़ रुपए हासिल करने का लक्ष्य रखा था। जिसे लेकर नया विवाद छिड़ गया।

जम्मू के कुछ लोगों का आरोप है कि पिछली सरकारों ने ऐसा करके हिंदु बाहुल्य जम्मू का जनसंख्या अनुपात बिगाड़ना था क्योंकि 25000 से ज्यादातर मामले जम्मू से आए व 4500 मामले कश्मीर में पाए गए। फिलहाल यह पूरा मामला एक बार फिर हाईकोर्ट में है। सभी नेता खुद को पाक साफ ठहरा रहे हैं। कुछ पीडि़त इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में भी लेकर गए थे। मगर उसने साफ कर दिया कि जब तक यह मामला हाईकोर्ट में चलेगा तब तक उसको इसे सुनने की कोई जरूरत नहीं है।

फिलहाल वहां कोई सरकार न होने के कारण राजनीतिक हस्तक्षेप कम होता नजर आ रहा हैं। पिछले दिनों तो इस आशय की खबर भी आई थी कि जिन लोगों को रोशनी योजना के तहत जमीने दी गई थी उनमें भाजपा के कुछ नेताओं के परिवार के सदस्य भी शामिल थे। याद दिला दे कि भाजपा ने भी पीडीपी के साथ मिलकर राज्य में अपनी सरकार बनाई थी। फिलहाल देखना यह है कि राजनीतिज्ञो की इस बंदरबाट का हश्र क्या होता है। वहीं प्रशासन ने अपनी  तोड़-फोड़ कर लोगों को उजाड़ना शुरू कर दिया है।

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