क्योंकि ये मुद्दा नहीं है


देश में बेरोजगारी का हाल कितना बुरा है, इसे बताने के लिए अब शायद उदाहरणों की भी जरूरत नहीं है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि ये सूरत देश में सियासी मुद्दा नहीं है। मीडिया और राजनीतिक चर्चा में इसकी आज कोई अहमियत नहीं है। जबकि आम लोगों की जिंदगी बेहाल होती जा रही है। पिछले हफ्ते इस सूरत पर रोशनी डालने वाला मामला फिर सामने आया, जब रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) में नई भर्ती हुई। महिला कांस्टेबलों की पासिंग आउट परेड में 248 प्रशिक्षुओं में ज्यादातर ऐसी थीं, जिनके पास एमबीए, एमसीए, बीटेक, एमटेक और अन्य तकनीकी डिग्रियां हैं। गौरतलब है कि इस पद के लिए सिर्फ बारहवीं तक की डिग्री की जरूरत होती है। ये सभी प्रशिक्षु राजस्थान, पंजाब, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, यूपी, पश्चिमी बंगाल, हरियाणा और छतीसगढ़ राज्यों से हैं। उनसे जो बातचीत मीडिया के एक हिस्से में छपी, वह मार्मिक है। मसलन एक प्रशिक्षु ने कहा- “नौकरी की जरूरत थी।

भर्ती का आवेदन निकला, तो हमने भी अप्लाई कर दिया और तैयारी भी की। यह मेरी मंजिल नहीं है।” इस प्रक्रिया के एक जानकार ने उचित ही इस बात पर रोशनी डाली कि उच्च शिक्षित लोगों का इन परीक्षाओं के लिए आवेदन करने का नतीजा यह होता है कि इससे अन्य अभ्यर्थियों का नुकसान होता है। बहुत पढ़े-लिखे लोग लिखित परीक्षा आसानी से पास कर लेते हैं, जबकि केवल इंटर तक पढ़े लोगों के पास कांस्टेबल जैसी नौकरियों का ही विकल्प होता है। एमबीए-एमसीए और बीटेक-एमटेक लोगों को तो और भी बहुत सी नौकरियां मिल सकती हैं। इससे पहले यूपी में सचिवालय में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी और जिलों में सफाई कर्मचारियों के लिए नौकरी विज्ञापित हुई थी, तब भी हजारों की संख्या में उच्च शिक्षित लोगों ने आवेदन किया था। उनमें से बहुत से चयनित भी हुए। यह तो साफ है कि कोई इंजीनियर और एमबीए कांस्टेबल या सफाई कर्मचारी नहीं बनना चाहता है। लेकिन बेरोजगारी की मजबूरी में ही वह ऐसे विकल्प चुनता है। इंजीनियरिंग कॉलेज और मैनेजमेंट कॉलेजों में चार साल की पढ़ाई के दौरान बच्चे करीब आठ-दस लाख रुपये खर्च करते हैं, लेकिन बाहर निकलने पर उन्हें 15-20 हजार रुपये प्रति माह की नौकरी भी नहीं मिल पा रही है। इस हाल का क्या समाधान है? दुखद यह है कि ऐसे सवाल आज देश के सत्ताधारियों की नजर में अप्रसांगिक से हो गए हैं।

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