अच्छा विपक्ष चाहिए या अच्छी सरकार!


भारत में सबको एक मजबूत और अच्छे विपक्ष की जरूरत महसूस हो रही है। देश में एक चुनी हुई सरकार है, जो लगभग हर मोर्चे पर विफल हो गई है, उसकी चिंता किसी को नहीं है। एक अच्छी सरकार हो, जो इस महामारी के समय स्वास्थ्य सुविधाओं को संभाले व बेहतर करे और महामारी से पैदा हुई आर्थिक समस्याओं से लोगों को बचाए, इसकी चिंता किसी को नहीं है। प्रधानमंत्री और उनकी सरकार के बाकी मंत्री क्या कर रहे हैं, इसकी भी चिंता किसी को नहीं है। कोरोना संकट, किसान आंदोलन और तमाम दूसरी समस्याओं के बीच प्रधानमंत्री इवेंट मैनेजमेंट कंपनी की ओर से आयोजित देव दीपावली के उत्सव में शामिल हो रहे थे और देश के गृह मंत्री नगर निगम के चुनाव प्रचार में रैलियां कर रहे थे।

पर यह सब एक सामान्य प्रक्रिया के तहत लिया जा रहा है। माना जा रहा है कि यह उनका काम है, जो वे कर रहे हैं। असली सवाल यह है कि विपक्ष क्या कर रहा है? यानी एक विफल सरकार से ज्यादा चिंता कमजोर विपक्ष की है!

यह विमर्श देश में अचानक नहीं बना है और न अपने आप बना है। यह एक विनिर्मित आइडिया है, जिसे राजनीतिक विमर्श के तौर पर स्थापित किया गया है। मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए इसे मैन्यूफैक्चर किया गया और फिर जाने-अनजाने में इसमें देश की बौद्धिक जमात के लोग भी शामिल हो गए हैं। वे भी मानने लगे हैं कि देश की सारी समस्या की जड़ एक मजबूत विपक्ष का नहीं होना है। फिर जब यह विमर्श आगे बढ़ता है तो सिर्फ एक ही बात दिखाई देती है कि सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस कितनी कमजोर हो गई है। उसका नेतृत्व कितना कमजोर हो गया है। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का नेतृत्व कितना बंटा हुआ है। राहुल गांधी कितने नासमझ हैं, जो राजनीतिक हकीकत देख-समझ नहीं पा रहे हैं। इस तरह मजबूत विपक्ष की सारी बहस कांग्रेस की कमजोरी पर आकर खत्म हो जाती है।

असल में भाजपा और केंद्र सरकार बहस को वहीं पर ले जाना चाहती है, इसलिए बहस वहीं पर पहुंचती है। असलियत में यह सवाल ही नहीं होना चाहिए कि विपक्ष क्या कर रहा है और उसे क्या करना चाहिए। विपक्ष कुछ भी करे, उससे क्या होना है? आजादी के बाद के इतिहास का अध्ययन करने वाला कोई व्यक्ति बता दे कि जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक विपक्ष ने किस सरकार के कितने फैसले बदलवा दिए या सरकारों को कितना मजूबर किया? भारत में सरकार हमेशा माई-बाप रही है। एचडी देवगौड़ा और आईके गुजराल सरकार की भी बांह मरोड़ कर विपक्ष कुछ नहीं करा सका था। इसलिए मजबूत विपक्ष की बात करना एक किस्म के राजनीतिक भ्रमजाल में फंसना है, जिसका इस समय कोई मतलब नहीं है।

इस समय देश के लोगों को सबसे पहले संसदीय प्रणाली वाली भारत की राजनीतिक व्यवस्था की बुनियादी बातों में आ रही कमजोरियों को समझना होगा। यह देखना होगा कि किस तरह से एक चुनी हुई सरकार धीरे धीरे पूरी व्यवस्था को बदलती जा रही है और लोग इसके लिए सरकार को जिम्मेदार मानने की बजाय मजबूत विपक्ष तलाश रहे हैं। मजबूत विपक्ष क्या कर लेगा, अगर जनधारणा उसके अनुकूल नहीं है या जैसा सरकार चाहती है, वैसी जनधारणा है? मिसाल के तौर पर अभी चल रहे किसान आंदोलन को देख सकते हैं। यह एक मजबूत आंदोलन है, जिसमें कई राज्यों के किसान शामिल हैं और बहुत वाजिब मांगों को लेकर कड़ाके की ठंड में आंदोलन कर रहे हैं। पर क्या मजबूत विपक्ष की मांग करने वाले लोग इस आंदोलन के साथ खड़े हैं?

क्या देश के आम लोगों को लग रहा है कि किसानों की मांग वाजिब है और सरकार को उनकी बात सुननी चाहिए? मीडिया और सोशल मीडिया दोनों जगह अलग ही विमर्श चल रहा है। ज्यादातर जगहों पर किसान आंदोलन का विरोध देखने को मिल रहा है। किसान आंदोलन को सीएए आंदोलन पार्ट टू बताया जा रहा है। कोई किसानों को खालिस्तानी बता रहा है तो कोई इसे आढ़तियों का आंदोलन बता रहा है तो किसी को लग रहा है कि यह कांग्रेस का आंदोलन है। जब लोगों में इतनी बेसिक बातों की समझदारी नहीं है या इतनी बेसिक बातों में लोग सरकार के प्रोपेगेंडा से प्रभावित होते हैं तो फिर मजबूत विपक्ष की मांग का क्या मतलब रह जाता है?

भारत और ब्रिटेन दोनों देश के संसदीय इतिहास और परंपराओं के जानकार विद्वान एजी नूरानी ने ब्रिटिश संसद की एक साझा समिति की 1933-34 की रिपोर्ट के आधार पर बताया है कि संसदीय प्रणाली की शासन व्यवस्था के सुचारू रूप से चलने के लिए चार चीजों की जरूरत है। पहली चीज है, बहुमत का शासन। दूसरी, अल्पमत में आने वाले द्वारा बहुमत के शासन के फैसलों को एक निश्चित समय तक स्वीकार करने की सहमति। तीसरी, बड़े राजनीतिक दलों की मौजूदगी, जो छोटे-छोटे स्वार्थों की बजाय बड़े नीतिगत मसलों पर मतभेद रखते हों। और चौथी, एक ऐसी राजनीति विचारधारा या सोच का अस्तित्व, जिसका स्थायी जुड़ाव किसी एक पक्ष के साथ नहीं हो, जो अपनी आंतरिक भावनाओं से निर्देशित हो और एक तरफ अति होते देख, दूसरी ओर जाने के लिए तैयार हो। यह एक जीवंत जनभावना है और वहीं अंततः लोकतंत्र व संसदीय प्रणाली की जान है। यहीं जीवंत भावना अमेरिका में अंत में डोनाल्ड ट्रंप की हार का कारण बनी। किसी अति से प्रभावित होकर राय बदलने वाली मोबाइल ओपीनियन ही वह चीज है, जो लोकतंत्र और संसदीय प्रणाली दोनों को बचा सकती है।

अफसोस की बात है संसदीय प्रणाली की व्यवस्थाओं को बचाए रखने के लिए जरूरी चारों चीजों की भारत में कमी हो गई है। भारत में बहुमत का शासन है पर वह बहुमत के लिए शासन में तब्दील हो गया है। जो अल्पमत में आया है, उसे पहले दिन से बहुमत का शासन मंजूर नहीं है। पार्टियों के बीच नीतिगत मसलों से ज्यादा बहुत छोटे-छोटे स्वार्थों पर टकराव है। कांग्रेस पार्टी कोई नीतिगत मुद्दा उठाएगी तो उसका जवाब देने की बजाय सरकार की ओर से उसके नेताओं को वंशवादी बताया जाने लगेगा। जरूरी मुद्दों का जवाब देने की बजाय सरकार के लोग विपक्षी नेता को पप्पू ठहराने में ज्यादा मेहनत करते हैं। इसका कुल जमा नतीजा यह हुआ है कि संसदीय प्रणाली और उसे चलाए रखने वाली राजनीतिक व्यवस्था में लगातार आ रही गिरावट की बजाय सबका ध्यान कमजोर विपक्ष पर टिका दिया गया है। सारी समस्याओं का रामबाण इलाज मजबूत विपक्ष को बताया जाने लगा है, जबकि हकीकत में विपक्ष कितना भी मजबूत हो, वह किसी समस्या का समाधान नहीं है। असली समाधान सरकार ही है, जो अभी विपक्ष से भी गई-गुजरी दिख रही है।

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