उफ! बांग्लादेश का रोहिग्या मुसलमानों से सलूक!


मेरा मानना है कि दुनिया में सबसे बुरा शब्द शरणार्थी है। अपने देश के आतंरिक हालातों से कोई 
नागरिक अपना देश छोड़कर पड़ोस के किसी और देश में शरण लेने के लिए मजबूर हो तो उस पड़ोसी देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया उसे गिरी हुई नजरो से देखती हैं। जब आईएस का आतंक बढ़ा था तो उनसे जान बचाकर नाव के जरिए समुद्र पार कर रहे एक बच्चे का तट के किनारे शव के फोटो को देखकर पूरी दुनिया के लोगों का दिल दहल गया था। अब नवीनतम मामला रोहिंग्या मुसलमानों  का है। उन्हें बांग्लादेश का मूल निवासी माना जाता है जोकि पड़ोसी म्यांमार में जा कर रहने लगे थे।

बाद में इन्हे म्यंमार से भगाया गया तो इनमें से बड़ी संख्या में ये भारत आए हैं व जम्मू तक में बस गए हैं। जिन बांग्लादेशी शरणार्थियों को भारत आज भी झेल रहा है। वह बाग्लांदेश खुद रोहिंग्या को अपनाने से मुकर रहा हैं व उन्हें बहुत बड़ी समस्या मानता है। बड़ी तादाद में रोहिंग्या शरणार्थी अपनी जान बचाकर बांग्लादेश में फिलहाल है। उनका पुनर्वास इस देश के लिए बहुत बड़ी समस्या बनता जा रहा है।

हाल ही में उसने बहुचर्चित कॉक्स बाजार से रोहिंग्या शरणार्थीयों को निकाल बाहर करने के लिए एक नया तरीका ढूंढ़ा व उन्हे तट से करीब 40 किलोमीटर नदी में उभरे एक द्वीप भासन चार में बसा दिया। चार का मतलब द्वीप ही है। म्यांमार के राखीन राज्य में सेना द्वारा किए गए अत्याचार से घबराकर करीब 8 लाख लोग अपनी जान बचाने के लिए म्यांमार से भागकर बांग्लादेश में हैं।

कहते है कि सेना ने पुरुषो की हत्या की, महिलाओं के साथ बलात्कार किया व बच्चों को तरह-तरह की यातनाएं दी। उनके घरो को आग लगाकर उन्हें लूट लिया। म्यांमार की सेना का आरोप था कि उसने जिन लोगों पर हमला किया वे उसके अपने देश के लोग न होकर अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी के आतंकवादी थे। जिसमें बड़ी तादाद में इस्लामी आतंकवादी शामिल हैं।

संयुक्त राष्ट्र के जांच दल ने इन लोगों पर हुए अत्याचारो को बेहद दर्दनाक करार देते हुए इसे मानवता के खिलाफ अपराध करार दिया है। सेना के द्वारा किए गए बलात्कारो को उसने मानवता के खिलाफ अपराध माना था। पिछले साल गांबिया नामक अफ्रीकी देश ने इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के सहयोग से इस मामले को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में म्यांमार के खिलाफ उठाने की कोशिश की। गांबिया का आरोप था कि म्यांमार ने रोहिंग्या लोगों का नरसंहार किया है। सुनवाई के दौरान वहां की जानी-मानी नेता आंग सान सुई अपने देश का पक्ष रखने के लिए अदालत में पेश हुई। वहां उन्होंने जमकर अपनी सेना का पक्ष रखते हुए उसका बचाव किया।

उनके इस कदम की पूरी दुनिया में आलोचना हुई व उन्हें दिया गया नोबेल पुरुस्कार भी वापस लिए जाने की मांग उठने लगी। बाद में अदालत ने अपने आदेश में म्यांमार से अपना रवैया बदलते हुए रोहिंग्या लोगों पर अत्याचार न करने का व उनके साथ अच्छे तरीके से पेश आने को कहा। म्यांमार के खिलाफ नरसंहार के अपराध का कोई दंड देने का आदेश नहीं दिया गया और सारा मामला आया गया हो गया। म्यांमार उसका कोई भी आदेश मानने के लिए वैसे ही बाध्य नहीं था।

म्यांमार में आज भी रोहिंग्यों पर अत्याचार जारी हैं। वहां हाल में ही चुनाव में सुई की पार्टी को 2015 के मुकाबले कहीं ज्यादा बहुमत मिला। उनके इलाके में एक भी रोहिंग्या नहीं है व ऐसा माना जाता है कि उनकी पार्टी को सबसे बड़ा दल बनाने में सेना का बहुत बड़ा हाथ रहा। इस चुनाव के पहले ही से सभी रोहिंग्या मतदाताओं को भगा दिया गया था व चुनाव में एक भी रोहिंग्या उम्मीदवार मैदान में नहीं था। जिन लोगों ने चुनाव के लिए अपना परचा भरा था वे अपनी नागरिका प्रमाणित नहीं कर पाए। इस मामले में चीन म्यांमार की करनी का समर्थक रहा है। जबकि रोहिंग्या लोगों को अपना नागरिक न मानते हुए भी बांग्लादेश उनके लिए थोड़ा बहुत कर रहा हैं।

बांग्लादेश ने रोहिंग्या शरणार्थी की समस्या का समाधान ढूंढ़ने के लिए 2017 में उनके पुनर्वास की योजना शुरू की थी। क्योंकि कॉक्स बाजार में रहने वाले रोहिंग्या शरणार्थी वहां बहुत गंदे व अमानवीय हालात में रह रहे थे। बांग्लादेश की सेना ने जहाजो में भरकर कॉक्स बाजार में रह रहे करीब आठ लाख रोहिंग्या शरणार्थीयो को भासन चार द्वीप पर पहुंचा दिया है। चारो और पानी से घिरे इस द्वीप को छोड़ने की उन्हें अनुमति नहीं है। वे वहां से सिर्फ अपने देश म्यांमार ही जा सकते हैं। यह द्वीप अन्य द्वीपो की तरह समुद्र तट के पानी के तल से बहुत ऊंचा न होकर कुछ फुट ही ऊंचा है। वहां ज्वार भाटा आने पर पानी भरने का खतरा पैदा होता है। मानसून में तो यह द्वीप समुद्र में डूब ही जाता है। यह द्वीप मेघना नदी के मुहाने पर स्थित है व यह नदी बहते हुए बंगाल की खाड़ी में जाकर मिलती हैं। यह द्वीप महज मिट्टी के जमाव के कारण उभर कर अस्तित्व में आया था। यह द्वीप करीब 40 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है। वहां बांग्लादेश सरकार ने घर, अस्पताल व मस्जिदे बनाई। इनके निर्माण पर करीब 272 मिलियन डालर रुपए खर्च हुए। बाढ़ का पानी रोकने के लिए ब्रिटिश व चीनी कंपनियों ने द्वीप के चारो और बांघ भी बनाए हैं। वहां बनाए गए घरो में करीब एक लाख लोग रह सकते हैं। ये घर भूमि तल से महज चार मीटर ही ऊंचे है।

वहां रहने वाले लोग अपने साथ अपने पशु लाकर वहां खेती कर सकते हैं। पर वे लोग किसी तरह से पैसे का लेन-देन नहीं कर सकते। अधिकारिक तौर पर सरकार उन्हें शरणार्थी नहीं मानती हैं व उन्हें नागरिकता विहीन व्यक्ति मानती हैं। वहां अनेक अनाथालय भी खोले गए हैं। हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ का मानना है कि वहां रहने व आजीविका कमाने के पर्याप्त साधन नहीं हैं जो वहां के हालात है उन्हें देखते हुए यह कह पाना मुश्किल है कि क्या इंसान वहां अपनी जिदंगी बिता भी सकता है।

वहां लाए गए लोगों को लगता था कि उन्हें वहां अपना घर व बेहतर जिदंगी व्यतीत करने के लिए मिल जाएगी। मगर जबरन लाए गए इन लोगों का सपना बिखर गया। म्यांमार रोहिंग्या लोगों को अपना मूल निवासी मानने की जगह उन्हें बंगाली कहकर बुलाता है व खुद रोहिंग्या भी वहां जाने से मना करते आए हैं। इन लोगों का भविष्य क्या होगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा। इसे समय का फेर नहीं तो और क्या कहा जाए कि शब्द बांग्लादेश हमारे देश में शरणार्थी शब्द का पर्याय बन चुका है और वह खुद अपने यहां शरणार्थियो का पुनर्वास कर रहा है।

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