6 साल में बैंकों के डूबे 46 लाख करोड़ रुपए, सरकारी बैंकों की कर्ज में डूबी 88% रकम


नई दिल्ली। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने अपनी एनुअल स्टैटिकल रिपोर्ट सामने आई है, जिसके अनुसार, पिछले छह वर्षों में यानी 2014 से 2020 के दौरान नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) की कुल राशि 46 लाख करोड़ रही है। बीते एक दशक में UPA की सरकार चार वर्ष रही है, जबकि छह वर्ष NDA की सरकार रही है। वर्ष 2011 से 2014 UPA सरकार के दौरान NPA की बढ़ने की दर 175 प्रतिशत रही, जबकि NDA की सरकार में शुरुआती चार वर्ष में NPA की दर 178 प्रतिशत रही। दिखने में तो ये सिर्फ तीन प्रतिशत के बढ़ोत्तरी है लेकिन रुपयों में अगर इन्हे देखा जायेगा तो फर्क काफी बड़ा है। मनमोहन सिंह की सरकार ने जहां NPA 2 लाख 64 हजार करोड़ पर छोड़ा था वहीं मोदी सरकार में ये बढ़कर 9 लाख करोड़ तक पहुंच चुका है।

NPA का प्रभाव आम आदमी पर पड़ता है। जब कोई संस्था और व्यक्ति बैंक से कर्ज लेता है और उसे चूका नहीं पाता है। तो बैंक फिर रिकवरी करती है। इसमें अक्सर देखा गया है कि, रिकवरी हो नहीं पाती है या फिर जो होती है वो न के बराबर ही होती है। नतीजा ये होता है कि, बैंक द्वारा दिया गया कर्ज डूब जाता है। इसकी वजह से बैंक बंद होने की भी नौबत आ जाती है। घाटे में चल रहे बैंक में आम लोगों का पैसा फंस जाता है। बैंक के खाते में मौजूद राशि उन्हें मिलती तो है लेकिन जब जरूरत होती है तब नहीं मिलती। बैंक कई तरह की रोक और नियम बना देता है।

पिछले दिनों आपने जरूर ऐसे ही बैंक का नाम सुना होगा, जिसका नाम PMC है। जिसके ग्राहक काफी ज्यादा परेशान हुए थे। बैंक ने रियल स्टेट कंपनी HDIL को चार हज़ार करोड़ रुपए दिए लेकिन वो कंपनी दिवालिया हो गई। कर्ज देते वक़्त भी बैंक ने RBI के नियमों को भी नजरअंदाज किया था। वर्ष 2020 में बैंकों का जितना रुपया डूबा है, उसमे से 88 प्रतिशत राशि सरकारी बैंकों की है।

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