सुरक्षा अलर्ट्स को नजरअंदाज कर गणतंत्र दिवस पर 60,000 ट्रैक्टर के साथ भयानक अराजकता फैलने के आसार

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देश की संसद द्वारा पारित कृषि कानूनों को लेकर एक तरफ जहां किसान सरकार से बातचीत के नाम पर अपनी मांगें पूरी होने के बावजूद जिद पर अड़े हैं तो दूसरी ओर वो अराजकतावादी विरोध प्रदर्शन भी कर रहे हैं। कुछ ऐसा ही 26 जनवरी को प्रस्तावित उनकी 60 हजार की संख्या वाली ट्रैक्टर रैली को लेकर भी कहा जा रहा है, क्योंकि उनकी ट्रायल रैली में ही  राजधानी दिल्ली की स्थिति बेहाल हो चुकी है। गणतंत्र दिवस के संवेदनशील अवसर पर खालिस्तानी लिंक वाला तथाकथित किसान आंदोलन बेहद ही घातक सिद्ध हो सकता है। ऐसे में ये सवाल उठना लाजमी है कि अगर इस आंदोलन की आड़ में अप्रिय घटना होती है तो उसका जिम्मेदार कौन होगा ?

किसान आंदोलन के नाम पर केवल अराजकता ही हो रही है। राजधानी सीमाओं पर यातायात प्रतिबंधित करने से लेकर टोल नाकों को फ्री करना इसका एक उदाहरण है। ऐसे में किसान संगठनों का कहना है कि अगर उनकी मांगों को जल्द से जल्द नहीं माना गया तो वो 26 जनवरी के अवसर पर राजधानी दिल्ली में 60 हजार ट्रैक्टरों के साथ रैली करेंगे। उनकी इस रैली वाली अराजकता का असर 7 जनवरी को ही देखने को मिल चुका है जब 3,500 ट्रैक्टरों के रैली रिहर्सल के दौरान दिल्ली की सभी सीमाओं पर डायवर्जन की स्थितियां पैदा हो गईं थी व सुरक्षा व्यवस्था संभाल रहे पुलिसकर्मियों के हाथ पांव फूल गए थे।

हैरान करने वाली बात ये है कि रैली की रिहर्सल में महिलाएं ट्रैक्टर चलातीं नजर आईं। ये ठीक वैसी ही स्थिति है जैसी शाहीन बाग के अराजक आंदोलन की थी जिसमें पुरुषों ने एक सोची समझी साज़िश के तहत महिलाओं को आगे कर दिया था। इस पूरी रिहर्सल के दौरान पुलिस भी चौकसी में नजर आईं और रूट डायवर्ट करने से लेकर सुरक्षा के लिए रैली की वीडियोग्राफी रिकार्डिंग की भी स्थिति संभाली, क्योंकि ऐसी अराजकता का फायदा उठाकर ही कुछ असामाजिक तत्व अप्रिय घटनाओं को अंजाम दे सकते हैं।

कल्पना कीजिए की देश जब अपने लोकतन्त्र का गणतंत्र दिवस का जश्न मना रहा होगा, तब ये किसान दिल्ली की सीमाओं से लेकर पूरी राजधानी में ट्रैक्टर रैलिया़ं निकाल रहे होंगे। ये बेहद ही भयावह स्थिति हो सकती है। राजधानी दिल्ली पूरी तरह अव्यवस्थित हो जाएगी। इसके अलावा सबसे बड़ा खतरा सुरक्षा व्यवस्था पर है। राष्ट्रीय समारोहों पर आतंकी संगठनों की नजर में दिल्ली हमेशा ही रहती है जिसके चलते दिल्ली का चप्पा-चप्पा हाईअलर्ट पर रहता है। ऐसे मे़ जब अपने ही बीच के लोगों द्वारा अराजकता होगी, तो किसी आतंकी घटना को लेकर सुरक्षा व्यवस्थाएं अपंग हो जाएगी।

वही किसान आंदोलन में खालिस्तानी एंगल एक मुद्दा है। TFI की रिपोर्ट्स में हम बता चुके हैं कि किसानों के गुटों में खालिस्तान के समर्थन में ट्रैक्टर पर लगे पोस्टर संदेहास्पद हैं। वहीं सिख फॉर जस्टिस और खालसा एड जैसी संस्थाएं इसमें सक्रिय हैं, जो नाम तो सामाजिक कार्यों का देती हैं लेकिन उनके सारे काम अलगाववादी ही हैं। ऐसे में यदि ऐसा कोई खालिस्तानी आतंकी हमला इस किसान आंदोलन की आड़ में खालिस्तानियों द्वारा होता है तो किसानों की छवि पर एक नकारात्मक असर जाएगा, वही इस अराजक ट्रैक्टर रैली की आड़ में होने वाली किसी भी अप्रिय घटना का जिम्मेदार कौन होगा?

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