गलती सिर्फ नेहरू की नहीं है!


कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भारत सरकार की चीन नीति को लेकर सवाल उठाया तो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पंडित नेहरू की गलतियां गिनाईं। उन्होंने राहुल से उनके परनाना की गलतियों पर सवाल किया। तभी यह सवाल है कि क्या चीन को लेकर गलती सिर्फ पंडित नेहरू ने की थी? यह सही है कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गलती की थी, जो तिब्बत पर चीन के हमले का विरोध नहीं किया और हमलावर चीन के साथ पंचशील समझौता किया। लेकिन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी गलती की थी, जो उन्होंने तिब्बत पर चीन के अधिकार को मान्यता दे दी। नरेंद्र मोदी उससे आगे की गलती कर रहे हैं, जो चीन को लेकर इस भ्रम में हैं कि उसके साथ सैन्य व कूटनीतिक वार्ताओं से सीमा पर सद्भाव बहाल हो जाएगा। वे इस गलतफहमी में हैं कि वे चीन के राष्ट्रपति शी जिनफिंग से 18 बार मिल चुके हैं, साबरमती रिवर फ्रंट पर उनको झूला झूला चुके हैं, वुहान और ममलापुरम में अनौपचारिक वार्ता कर चुके हैं, अनगिनत बार शी के गले लग चुके हैं इसलिए शी उनका लिहाज करेंगे। उन्होंने चीन की कंपनियों का हजारों करोड़ रुपए का निवेश गुजरात में कराया है, इसलिए भी उनको लग रहा है कि चीन भारत के साथ धोखा नहीं करेगा।

चीन को लेकर अपनी रूमानियत में पहली गलती पंडित नेहरू ने की थी। उन्होंने 1954 में चीन के साथ पंचशील समझौता किया, जिसमें एक-दूसरे की सीमा का सम्मान करने, एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देने, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, साझा हित और एक-दूसरे पर हमला नहीं करने जैसे पांच सिद्धांत शामिल किए गए। इस समझौते में उन्होंने दोनों देशों की सीमा तय नहीं कराई, जिसकी वजह से आज तक विवाद चल रहा है। इससे पहले उन्होंने तिब्बत पर चीन के हमले का विरोध नहीं करके हिमालयी भूल की थी। ध्यान रहे 1951 तक तिब्बत एक आजाद देश था और उस समय तक भारत की सीमा कहीं पर भी चीन के साथ नहीं मिलती थी। उससे पहले 1914 में अंग्रेजी हुकूमत के साथ तिब्बत का शिमला में एक समझौता हुआ था, जिसमें यह तय हुआ था कि हेनरी मैकमिलन की बनाई सीमा रेखा तिब्बत और भारत के उत्तर-पूर्व में दोनों देशों के बीच की सीमा रहेगी। इस तरह करीब चार हजार किलोमीटर की सीमा पर चीन कहीं भी भारत का पड़ोसी नहीं था।

चीन ने 1951 में तिब्बत पर हमला किया। उस समय पड़ोसी देश होने के नाते भारत का यह कर्तव्य था कि वह चीन के हमले की निंदा करे। सारी दुनिया उस समय भारत की ओर देख रही थी और जब उनको लगा कि पड़ोसी होकर भारत को चीन की आक्रामकता की चिंता नहीं है तो वे क्यों इसमें दखल दें। भारत की चुप्पी का नतीजा यह निकला कि चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया। भारत मूकदर्शक बना रहा। इसके तीन साल बाद जब नेहरू ने पंचशील का समझौता किया तो चीन पर इस बात का दबाव नहीं डाला कि मैकमोहन रेखा को दोनों देशों के बीच की सीमा रेखा माना जाए।

अगर तिब्बत की कीमत पर यह काम भी हो गया होता तो सीमा विवाद वैसा नहीं होता, जैसा अभी है। दोनों देशों के बीच सीमा रेखा स्पष्ट नहीं की गई, जिसका नतीजा है कि चीन आज भारत के कई हिस्सों पर अपना दावा कर रहा है। अप्रैल 1954 में हुए पंचशील समझौते के तीन महीने बाद ही नेहरू को चीन की गुंडागर्दी का अहसास हो गया, जब चीनी सैनिकों ने भारत के बाराहूती इलाके में हमला कर दिया। नेहरू अपनी गलती समझ गए थे और तभी उन्होंने 1957 में तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा को भारत में शरण दी और उन्हें भारत से तिब्बत की निर्वासित सरकार चलाने की इजाजत दी, जिसका बदला चीन ने 1962 में हमला करके लिया।

दूसरी बड़ी गलती अटल बिहारी वाजपेयी ने की, जब उन्होंने तिब्बत पर चीन के कब्जे को मान्यता दे दी। चीन के साथ सीमा विवाद सुलझाने के मुगालते में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जून 2003 में चीन के तब के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ के साथ ‘संबंधों और समग्र सहयोग के सिद्धांतों’ की साझा घोषणा पर दस्तखत किए थे। इसके तहत भारत ने ‘तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र’ को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का हिस्सा स्वीकार कर लिया। नेहरू ने भले तिब्बत पर चीन के हमले का विरोध नहीं किया था लेकिन उन्होंने चीन के कब्जे को भी स्वीकार नहीं किया था और दलाई लामा को तिब्बत की निर्वासित सरकार भारत से चलाने की इजाजत दी थी। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने तिब्बत पर चीन के कब्जे को मान्यता दे दी।

इस समझौते में वाजपेयी सरकार ने चीन से यह भी वादा किया कि तिब्बती लोगों को भारत अपनी सरजमीं से चीन विरोधी गतिविधियां नहीं चलाने देगा। इसके बदले में भारत को कुछ भी हासिल नहीं हुआ क्योंकि 2003 में पंचशील की तर्ज पर हुए नए समझौते में भी मैकमोहन लाइन को भारत और चीन के बीच की सीमा रेखा नहीं माना गया।

नेहरू और वाजपेयी की गलतियां इतिहास हो गईं लेकिन दुर्भाग्य से भारत की मौजूदा सरकार उन गलतियों से सबक लेने की बजाय उन्हीं गलतियों को दोहरा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा चीन के साथ किए समझौते को अक्षरशः लागू कर रहे हैं। उन्होंने चीन को खुश रखने के लिए दलाई लामा को उनके जन्मदिन की बधाई देनी भी बंद कर दी है, जबकि दूसरी ओर चीन भारत के साथ रोज नया मोर्चा खोल रहा है। उसने पैंगोंग झील  के एक हिस्से में भारत का बड़ा भूभाग कब्जा कर लिया है। उसने हॉट स्प्रिंग इलाके में अपने सैनिकों का जमावड़ा बनाया है और फिंगर चार से आठ के बीच के हिस्से पर भी कब्जा कर लिया है। उसने देपसांग में एक नया मोर्चा खोला है और पूर्वी हिस्से में डोकलाम पर कई साल से दावा कर रहा है। अब खबर है कि उसने अरुणाचल प्रदेश में चार किलोमीटर तक भारत की सीमा में घुस कर एक गांव बसा लिया है, जहां एक सौ से ज्यादा घर बनाए गए हैं। वह भूटान के पूर्वी हिस्से पर अपना दावा कर रहा है, जहां पहुंचने के लिए अरुणाचल प्रदेश से होकर जाना होगा।

दुर्भाग्य की बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक मजबूत नेता की अपनी गढ़ी हुई छवि में ऐसे कैद हो गए हैं कि वे देश को सचाई नहीं बता पा रहे हैं। उनको लग रहा है कि अगर देश के लोग जानेंगे कि चीन ने भारत की जमीन कब्जा कर ली है तो उनकी छवि का मिथक टूटेगा। मोदी की इस कमजोरी को चीन इस बात को समझ रहा है। उसे यह भी पता है कि भारत लंबे समय के युद्ध के लिए तैयार नहीं है। उसे यह इसलिए भी पता है क्योंकि अगर भारत सैन्य रूप से सक्षम और तैयार होता तो रक्षा मंत्री को लड़ाकू विमान खरीदने के लिए भाग कर रूस नहीं जाना होता। चीन को इसलिए भी यह पता है क्योंकि भारत उसके पिछलग्गू देश रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम खरीदने के लिए बेकरार है।

भाजपा के अपने सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम खरीदने की भारत की बेकरारी को बड़ी गलती करार दिया है। इससे चीन के खिलाफ भारत की सैन्य तैयारियों को कोई खास फायदा नहीं होगा, उलटे अमेरिका की नाराजगी बढ़ेगी। बहरहाल, भारत को अपनी सैन्य तैयारियां तेज करने के साथ ही ‘वन चाइना’ पॉलिसी पर सवाल उठाना चाहिए। तिब्बत को आजाद करने की मांग करनी चाहिए, ताइवान पर चीन के दावे का विरोध करके ताइवान के साथ कारोबारी व सैन्य सहयोग बढ़ाना चाहिए और हांगकांग में लोकतंत्र बहाली की मांग का समर्थन करना चाहिए। सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि आक्रमण की नीति ही चीन से अपनी सुरक्षा की सबसे अच्छी रणनीति है।

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