लालकिले पर जो भी हुआ सब एक साजिश का हिस्सा था और सरकार बस बात करती रह गयी


गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली में तथाकथित किसानों ने जो अस्थिरता पैदा की, उसके लिए किसानों की खूब आलोचना की जा रही है, लेकिन इस पूरे घटना क्रम के लिए जितने जिम्मेदार तथाकथित किसान हैं, उतनी ही जिम्मेदार देश की सरकार और गृहमंत्रालय भी हैं। किसानों ने इस मुद्दे पर शुरु से ही अपनी नीति साफ कर दी थी कि वो अब छूट पाते ही अराजकता फैलाएंगे, और उन्होंने किया भी वही। केन्द्र  सरकार किसानों के साथ बातचीत में इतनी व्यस्त थी कि उसने किसानों की मंशाओं पर ध्यान नहीं दिया। साथ ही जब किसानों ने लालकिले में इतनी अराजकता फैला दी, उसके बावजूद दिल्ली पुलिस के हाथ बंधे ही रहे, और इस पूरे अराजकता और कानून  व्यवस्था के खेल में जीत किसानों की अराजकता की ही हो गई।

देश की संसद द्वारा पारित कृषि कानूनों को लेकर दिल्ली की सामाओं पर किसानों के साथ केन्द्र सरकार बातचीत ही करती रह गई जबकि किसान अपने अराजकतावादी मंसूबों में पूरी तरह कामयाब हो गए।  दिल्ली पुलिस ने किसानों के साथ बातचीत के बाद उन पर इतना ज्यादा भरोसा कर लिया कि किसानों ने नियमों की धज्जियां ही उड़ा डाली। दिल्ली पुलिस ने तय किया था कि जब तक गणतंत्र दिवस की राजपथ वाली परेड पूरी नहीं होगी तब तक किसान ट्रैक्टर रैली नहीं निकालेंगे, लेकिन हुआ सब उल्टा ही।

किसानों ने दिल्ली पुलिस के साथ बैठ कर बनाए गए अपने ही सारे नियमों की धज्जियां उड़ा दीं। ये लोग सुबह से ही दिल्ली के सारे इलाकों में कानून व्यवस्था को धता बताते हुए लालकिले पर पहुंच गए और वहां निशान साहब का धार्मिक झंडा लगा दिया, जो कि देश के लिए एक शर्मनाक बात है। इन तथाकथित किसानों ने पुलिस पर हमला किया, सभी कानून तोड़े लेकिन पुलिस कोई कार्रवाई न कर सकी, क्योंकि पुलिस के जवानों के हाथ बंधे हैं जिसके चलते देश के गृह मंत्रालय पर सवाल खड़े हो गए हैं।

किसानों ने वो सब कर डाला जो करने की नीयत से पिछले दो महीनों से वो दिल्ली की सीमाओं पर बैठे थे। ये आशंकाएं थीं कि किसान 26 जनवरी को किसान ट्रैक्टर रैली के नाम पर सुरक्षा व्यवस्था के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं, इसको लेकर कई सुरक्षा एजेंसियों ने भी अलर्ट पर रहने की बात कही थी। ऐसे में जब किसानों के खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता थी, तो गृहमंत्रालय ने पुलिस के हाथ सांकेतिक रूप से बांध दिए। सुरक्षा व्यवस्था के मुद्दे पर अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती भी नहीं की गई। किसानों ने खुली छूट पाकर तांडव मचा डाला, जो कि आम दिल्लीवासी से लेकर पूरे देश के लिए शर्म का पर्याय बन गया।

लालकिले से लेकर दिल्ली की लगभग सभी सीमाओं पर किसानों ने क्या किया, वो पूरी दुनिया ने देखा।  पुलिस के जवानों पर ट्रैक्टर चढ़ाने की मंशा लेकर निकले किसानों ने मुख्य सड़को पर कलाबाजियां दिखाईं, मीडिया से लेकर आम नागरिकों की सुरक्षा को खतरे में डाला और सबसे बड़ी बात लालकिले पर धार्मिक झंडा फहरा दिया। इतना सब आपत्तिजनक हो जाने के बावजूद पुलिस हाथ बंधे होने के कारण आंसू गैस और लाठी चार्ज के अलावा और कुछ न कर सकी।

किसानों ने अपने अराजकता के सारे स्वार्थ सिद्ध कर लिए, और गणतंत्र दिवस के मौके पर पूरी दुनिया में भारत की छवि को बदनाम कर दिया। अब दिल्ली पुलिस चाहे जितनी भी कार्रवाइयां कर ले, गृह मंत्रालय चाहे जितनी भी मीटिंग कर ले, लेकिन देश की छवि तार-तार हो चुकी है, और किसान अराजकता फैलाने के अपने मकसद में कामयाब हो चुके हैं।

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