झाबुआ की शान: जंगल से जनमन तक कैसे पहुंची भूरी बाई ?


झाबुआ । आदिवासी बहुल झाबुआ जिले की झोली में एक और बड़ा राष्ट्रीय सम्मान आया है. ये सम्मान पिथौरा कला में महारत हासिल कर चुकीं झाबुआ की भूरी बाई को मिला है . पिथौरा कला की माहिर अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भूरी बाई को पदमश्री सम्मान मिला है. भोपाल के जनजातीय संग्रहालय में काम करने वाली भूरी बाई को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद पद्मश्री से सम्मानित करेंगे

गरीबी के फर्श से सम्मान के आसमान पर भूरी बाई

जनजाति संग्रहालय भोपाल में काम करने वाली भूरी बाई झाबुआ जिले की रहने वाली हैं . 2012 में पति और बच्चों के साथ मजदूरी करने के लिए भूरी भाई भोपाल आई थी. इस दौरान भारत भवन में वे मजदूरी करती थीं. मज़दूरी के दौरान अपने बच्चों के लिए भूरी बाई कुछ चित्र बनाने लगीं.

जगदीश स्वामीनाथन ने पहचानी भूरी बाई की प्रतिभा

खाली वक्त में उन्होंने चूने में लकड़ी डुबोकर अपने बच्चों के लिए फर्श पर कुछ अटपटे चित्र बनाने शुरु किए. चित्रकार जगदीश स्वामीनाथान के कहने पर भूरी बाई इन चित्रों को कैनवास पर उतारने लगीं. चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन के प्रोत्साहन से भूरी बाई पिथौरा कला में माहिर हो गईं. इसके बाद से भूरी बाई ने पिथौरा कला को अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि दिलाई.

पिता को देखा था पिथौरा के चित्र बनाते

भूरी बाई ने बचपन में अपने पिता को पिथौरा चित्र बनाते हुए देखा था. लेकिन उस दौर में महिलाओं को पिथौरा की चित्रकरी करने का अधिकार नहीं था. इस क्षेत्र में सिर्फ पुरुषों का वर्चस्व था. भूरी बाई बताती हैं कि वे बचपन मे रंग लेकर जंगल जाती थीं और पेड़ों पर चित्रकारी करती थीं. समाज ने उन्हें रोकने की लाख कोशिश की. लेकिन जब उनकी कला को सम्मान मिलने लगा, तो समाज को भी उनपर गर्व होने लगा

शिखर सम्मान और देवी अहिल्या सम्मान से नवाजा

भूरी बाई की कला को मध्यप्रदेश शासन ने भी सम्मान दिया. उन्हें शिखर सम्मान और देवी अहिल्या सम्मान से नवाजा. दम तोड़ती आदिवासियों की इस पिथौरा कला को भूरी भाई ने एक बार फिर से जीवित कर दिया.

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