दिमागी बुखार (मेनिंजाइटिस) है जानलेवा


वायरस और बैक्टीरियल संक्रमण से होने वाली इस बीमारी को आम बोलचाल की भाषा में दिमागी बुखार कहते हैं, इसमें संक्रमण की वजह से दिमाग और रीढ़ की हड्डी में सूजन आने से बुखार, सिरदर्द और गर्दन में अकड़न आ जाती है। मेडिकल साइंस के मुताबिक यह रोग मेनिन्जेस में सूजन से होता है, मेनिन्जेस उन तीन झिल्लियों (मेम्ब्रेन्स) को कहते हैं जो दिमाग और रीढ़ की हड्डी कवर करती हैं। मेनिंजाइटिस में इंफेक्शन की वजह से फ्लूड इन तीनों झिल्लियों के चारों ओर भरने लगता है। 95 प्रतिशत मामलों में ऐसा वायरस या बैक्टीरियल इंफेक्शन से होता है लेकिन 5 प्रतिशत मामलों में यह कैंसर, कैमिकल इरीटेशन, फंगल और किसी ड्रग (दवा) से हुई एलर्जी से होता है।

मेनिंजाइटिस के लिये जिम्मेदार ज्यादातर वायरस और बैक्टीरिया कन्टेजियस (संक्रामक) होते हैं जो  नजदीकी सम्पर्क, खांसी और छींकने  से बनी ड्रॉपलेट से फैलते हैं। हमारे देश में प्रतिवर्ष इसके दस लाख से अधिक मामले सामने आते हैं। वायरस से होने वाला मेनिन्जाइट्स ज्यादा खतरनाक नहीं होता लेकिन बैक्टीरिया से होने वाला मेनिन्जाइट्स लाइफ थ्रेटनिंग होता है।

लक्षण क्या हैं मेनिंजाइटिस के?

यह बीमारी चाहे वायरस से हो या बैक्टीरिया से दोनों में शुरूआती लक्षण एक जैसे होते हैं। जहां तक गम्भीरता की बात है तो बैक्टीरिया से होने वाली मैनिन्जाइटिस के लक्षण ज्यादा सिवियर (गम्भीर) होते हैं। इसके लक्षण पीड़ित की उम्र के हिसाब से अलग-अलग भी हो सकते हैं।

वायरल मेनिंजाइटिस : जब बच्चे इसकी चपेट में आते हैं तो उनमें भूख मरना, चिड़चिड़ापन, तंद्रा, सुस्ती और बुखार जैसे लक्षण उभरते हैं। वयस्कों में इस रोग की वजह से सिरदर्द, बुखार, गर्दन में अकड़न, दौरे (सीजर्स), तेज प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता, तंद्रा, सुस्ती, मतली, उल्टी और कम भूख लगने जैसे लक्षण उभरते हैं।

बैक्टीरियल मेनिंजाइटिस : इसके लक्षण अचानक उभरते हैं और इसमें जी मिचलाना, उल्टी, मानसिक स्थिति में बदलाव, मेमोरी चली जाना, सिरदर्द, बुखार, गर्दन में अकड़न, ठंड लगना, त्वचा में बैंगनी पैच उभरना, तेज प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता, तंद्रा और सुस्ती जैसे लक्षण उभरते हैं। इन लक्षणों के उभरने पर तुरन्त डाक्टर के पास जायें, इलाज में देरी जानलेवा हो सकती है।

फंगल मेनिंजाइटिस : इस टाइप के मेनिंजाइटिस में भी लगभग वही लक्षण उभरते हैं जो वायरल मेनिन्जाइट्स में होते हैं लेकिन इसमें व्यक्ति भ्रमित रहता है और उसे बुखार के साथ सिरदर्द ज्यादा होता है, कुछ लोगों को मितली और उल्टी भी महसूस होती है।

मेनिंजाइटिस रैशेज: बैक्टीरियल मेनिंजाइटिस , निसेरिया मेनिन्जाइटडिस नामक बैक्टीरिया के ब्लड स्ट्रीम में चले जाने से होता है इसलिये स्किन पर लाल चकत्ते उभरते हैं। मेनिंगोकोक्कल मेनिंजाइटिस इंफेक्शन फैलाने वाले बैक्टीरिया के ब्लड स्ट्रीम में बार-बार पैदा होने से कैपिलरीज के आसपास के सेल्स डैमेज होने लगते हैं जिससे कैपिलरीज से ब्लड लीक होने के कारण स्किन पर रैशेज उभरते हैं। ये रैशेज (चकत्ते) हल्के गुलाबी, लाल या बैंगनी हो सकते हैं। देखने में ये इस तरह से नजर आते हैं जैसे कि स्किन में सुइयां चुभायी गयी हों। जैसे-जैसे ब्लड में इंफेक्शन फैलता है तो ये ज्यादा संख्या में नजर आते हैं तथा इनका रंग डार्क तथा आकार भी बढ़ जाता है। शरीर के जिन भागों में स्किन कलर हल्का होता है वहां ये स्पष्ट दिखाई देते हैं।

क्या जटिलताएं हो सकती हैं?

बैक्टीरियल मेनिंजाइटिस बहुत खतरनाक है, इसके इलाज में देरी से मतिभ्रम, सीजर्स (दौरे), बहरापन, अंधापन, मेमोरी प्रॉब्लम, ऑर्थराइटिस, माइग्रेन सिरदर्द, ब्रेन डैमेज, हाइड्रोसिफलस और सब-ड्यूरल इम्फीमिया जैसे कॉम्प्लीकेशन हो जाते हैं। इस बीमारी से यदि ब्लड स्ट्रीम में पहुंचा बैक्टीरिया मल्टीप्लाइ होने लगे तो शरीर में ज्यादा टॉक्सिन्स फैलने से ब्लड वेसल्स डैमेज होने लगती हैं। यदि ब्लड इंफेक्शन और बढ़ जाये या जल्द कंट्रोल न हो तो मृत्यु भी हो सकती है। इसमें स्किन टिश्यू नष्ट होने से गैंगरीन का रिस्क बढ़ जाता है। न्यूमोकोक्कल मेनिंजाइटिस एक लाइफ थ्रेटिनिग कंडीशन है, इसमें समय पर इलाज के बावजूद भी 20 प्रतिशत मरीजों की मृत्यु हो जाती है और जो ठीक हो जाते हैं उन्हें लम्बे समय तक इसके दुष्प्रभाव झेलने पड़ते हैं। इस रोग से उबरने के बाद शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है जिसे सही स्तर पर आने में महीनों लग सकते हैं।

कितनी तरह की होती है ये बीमारी?

बैक्टीरियल और वायरल इसके सबसे कॉमन टाइप हैं, इनके अलावा इसके कई प्रकार होते हैं जैसेकि क्रिप्टोकोक्कल, जोकि फंगल इंफेक्शन से होता है और कारसीनोमेटॉस जोकि कैंसर से सम्बन्धित है।

वायरल मेनिंजाइटिस सबसे ज्यादा लोगों को अपना शिकार बनाता है इसीलिये मेनिंजाइटिस के 85 प्रतिशत मरीज इसी से पीड़ित होते हैं। यह इन्टेरोवायरस कैटागरी के वायरसों (कोक्ससैकी वायरस-ए, कोक्ससैकी वायरस-बी और इकोवायरस) से होता है और इसका सबसे ज्यादा प्रकोप गर्मी व बरसात में होता है। इन वायरसों के अलावा वेस्ट नाइल, इंफ्लूएंजा, मम्प्स, एचआईवी, मीजल्स, हरपीज और कोल्ट वायरस से भी मेनिंजाइटिस फैलता है। वायरल मेनिंजाइटिस के अधिकतर मरीज बिना इलाज के अपने आप ठीक हो जाते हैं केवल दो या तीन प्रतिशत मरीजों को इलाज की जरूरत पड़ती है।

बैक्टीरियल मेनिंजाइटिस अत्यन्त संक्रामक रोग है, यदि समय पर इसका इलाज न किया जाये तो इससे जान भी जा सकती है। वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार इससे पीड़ित 30 प्रतिशत बच्चे और 25 प्रतिशत वयस्क समय पर सही इलाज न मिलने से मर जाते हैं। यह रोग इन बैक्टीरिया की वजह से फैलता है-

स्ट्रेप्टोकोकस निमोनिया: यह बैक्टीरिया श्वसन तन्त्र, साइनस कैविटी और नेजल कैविटी पर अटैक करता है, इससे होने वाले रोग को न्यूमोकोक्कल मेनिंजाइटिस कहते हैं।

निसेरिया मेनिन्जाइटाइडिस: यह बैक्टीरिया लार और श्वसन तन्त्र से सम्बन्धित अन्य फ्लूड के माध्यम से फैलता है इससे होने वाले रोग को मेनिन्गोकोक्कल मेनिंजाइटिस कहते हैं।

हेमोफिलस इन्फ्लूएंजा: यह अत्यन्त घातक बैक्टीरिया है, इससे न केवल मेनिंजाइटिस होता है बल्कि यह ब्लड को संक्रमित कर देता है। इसकी वजह से विंड पाइप (श्वसन नलिका) सूज जाती है और सेल्यूलाइटिस तथा इंफेक्शियस ऑर्थराइटिस जैसे रोग भी हो जाते हैं।

लिस्टेरिया मोनोसाइटोजेन्स: मेनिंजाइटिस के लिये जिम्मेदार यह बैक्टीरिया खाद्य पदार्थों जैसेकि अन-पाश्चुराइज्ड डेयरी उत्पाद, कच्चा मीट, कच्ची सब्जियों और तरबूज से पैदा होता है, इससे होने वाले संक्रमण को लिस्टरिओसिस कहते हैं, इससे बुखार, डायरिया, मांसपेशियों में दर्द और चक्कर आने लगते हैं। बासा भोजन खाने से इससे संक्रमित होने के चांस बढ़ जाते हैं।

स्टेफाइलोकोक्कस आउरियस: यह बैक्टीरिया स्किन और रेसपिरेटरी ट्रैक पर अटैक करता है जिससे  स्टेफाइलोकोक्कस मेनिंजाइटिस नामक रोग होता है।

फंगल मेनिंजाइटिस

फंफूंद की वजह से होने वाला यह रेयर टाइप का मेनिंजाइटिस है। यह त्वचा को संक्रमित करता हुआ ब्लडस्ट्रीम में चला जाता जिससे दिमाग और स्पाइनल कार्ड के टिश्यू नष्ट होने लगते हैं। जिन लोगों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है वे जल्द इसकी चपेट में आते हैं। यह पक्षियों विशेष रूप से चमगादड़ों की बीट मिली मिट्टी में पाये जाने वाले क्रिप्टोकोक्कसहिस्टोप्लाज्मा और कोक्कीडायोडस नामक फंगल से फैलता है।

पैरासाइटिक मेनिंजाइटिस

यह मल और गंदगी में पनपने वाले परजीवियों से होता है। इसके अलावा जानवरों के भोजन, कच्ची मछली, पोल्ट्री और घोंघे पालने वाले फार्मों में पाया जाता है। मेडिकल भाषा में इसे इओसिनोफिलिक मैनिंजाइटिस या ईएम कहते हैं। इसके लिये एंजियोस्ट्रॉन्गिलस कैंटोनेंसिस, पॉयलिस्स्करिस प्रोसीओनिस और ग्नेथोस्तोमा स्पिनेगरम नामक पैरासाइट (परजीवी) जिम्मेदार हैं। यह एक व्यक्ति से दूसरे में नहीं फैलता लेकिन ये जानवरों को संक्रमित करता हैं और जब मनुष्य इन जानवरों को खाता है तो यह उसे संक्रमित कर देता है।

इनके अलावा अमीबिक मेनिंजाइटिस भी जानलेवा संक्रमण हैं जो दूषित झीलों, नदियों या तालाबों में तैरते समय शरीर में प्रवेश करता है और फिर दिमाग में पहुंचकर वहां के टिश्यू नष्ट करने लगता है जिससे मतिभ्रम, दौरे और अन्य गम्भीर समस्यायें पैदा हो जाती है।

किन्हें होती है ज्यादा जोखिम?

संक्रामक होने के कारण डे केयर सेन्टर, बोर्डिंग स्कूल, कॉलेज डॉरमेटरीज और बैरेक में रहने वालों को इसका रिस्क सबसे ज्यादा होता है। गर्भवती महिलायें को भी इसके एक प्रकार लिस्टोराइसिस होने का रिस्क बढ़ जाता है। यह संक्रमण लिस्टीरिया बैक्टीरिया होता है व मां से बच्चे में भी चला जाता है।

किसी भी उम्र के लोगों को मेनिंजाइटिस हो सकता है लेकिन 5 साल से कम उम्र के बच्चों को वायरस मेनिंजाइटिस का व नवजात शिशुओं को बैक्टीरियल मेनिंजाइटिस का रिस्क अधिक होता है। पशुपालन, पोल्ट्री और मछली पालन जैसे धंधों में काम करने वालों को इसके होने के चांस दूसरों की अपेक्षा कई गुना अधिक होते हैं।

कैसे पुष्टि होती है मेनिंजाइटिस की?

इसकी पुष्टि के लिये डाक्टर हेल्थ हिस्ट्री जानने के साथ फिजिकल जांच करते हैं। इस जांच में बुखार, हार्ट रेट, गर्दन की अकड़न और मानसिक अवस्था पर ध्यान दिया जाता है। कई बार डाक्टर लम्बर पंक्चर अर्थात स्पाइनल टेस्ट भी कराते हैं इससे उन्हें सेन्ट्रल नर्वस सिस्टम में प्रेशर के अलावा स्पाइनल फ्लूड में बैक्टीरिया और सूजन का पता चल जाता है। कौन सी एंटीबॉयोटिक सबसे बढ़िया रहेगी यह भी इसी टेस्ट से डिसाइड होता है। इसके अलावा ये टेस्ट भी किये जाते हैं-

ब्लड कल्चर: इससे ब्लड में बैक्टीरिया का पता चलता है। ब्लड में मौजूद बैक्टीरिया दिमाग में चला जाता है जिससे मेनिंजाइटिस के अलावा सेप्सिस भी हो सकता है इसलिये ब्लड कल्चर टेस्ट से बैक्टीरिया के टाइप और उसकी स्ट्रेन्थ का पता लगाते हैं।

सीबीसी: कम्पलीट ब्लड काउंट नामक इस टेस्ट से ब्लड में रेड और व्हाइट ब्लड सेल्स का पता चलता है। चूंकि व्हाइट अर्थात सफेद रक्त कणिकायें संक्रमण से लड़ती है इसलिये इस रोग से पीड़ित होने पर ब्लड में इनकी संख्या बढ़ जाती है जिससे काफी हद तक इस बीमारी की पुष्टि हो जाती है।

चेस्ट एक्स-रे: चेस्ट और फेफड़ों में संक्रमण का पता लगाने के लिये यह टेस्ट किया जाता है।  मेनिंजाइटिस अक्सर निमोनिया और ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) के बाद हो जाता है ऐसे में चेस्ट-एक्सरे से इनके बारे में भी जानकारी मिलती है।

सीटी-स्केन: बैक्टीरिया ने दिमाग को किस हद तक नुकासान पहुंचाया है इसकी जांच के लिया सीटी स्कैन करते हैं। इस टेस्ट से ब्रेन एब्सेस अर्थात सिनसाइटिस का पता चलता है।

ग्लास टेस्ट: फिजिकल जांच में डाक्टर ग्लास टेस्ट भी करते हैं। इसके अंतर्गत स्किन के चकत्तों पर ग्लास को रोल करते हैं यदि ग्लास के प्रेशर से ये फेड न हों तो इन्हें मेनिनजाइटिस के रैशेज या चकत्ते माना जाता है।

इलाज क्या है मेनिंजाइटिस का?

बैक्टीरियल मेनिंजाइटिस में तुरन्त अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत पड़ती है। जितनी जल्दी इसकी पुष्टि होकर इलाज शुरू हो जाये ब्रेन टिश्यू डेमेज होने के चांस उतने ही कम हो जाते हैं। इस रोग का इलाज इंट्रावीनस एंटीबॉयोटिक से किया जाता है ताकि बैक्टीरिया पर जल्द काबू किया जा सके। इसके लिये कौन सा एंटीबॉयोटिक प्रभावी होगा यह पूरी तरह से बैक्टीरिया पर निर्भर है।

वायरल मेनिंजाइटिस के ज्यादातर मामलों में एक या दो सप्ताह में मरीज अपने आप ठीक हो जाते हैं। कुछ मामलों में एंटीवायरल दवाओं की जरूरत पड़ती है। जब केस गम्भीर नजर आता है तो डाक्टर इन्ट्रावीनस एंटीवायरस दवायें देते हैं।

पैरासाइटिक मेनिंजाइटिस का इलाज इसके लक्षणों के आधार पर किया जाता है जैसेकि बुखार होने पर केवल इसी की दवा देते हैं। गम्भीर मामलों में सीधे-सीधे संक्रमण का इलाज किया जाता है,  आमतौर पर यह रोग बिना एंटीबॉयोटिक के ठीक हो जाता है, लेकिन गम्भीर स्थिति में डाक्टर इंफेक्शन रोकने के लिये एंटीबॉयोटिक दे सकते हैं।

फंगल मेनिंजाइटिस का इलाज एंटीफंगल दवाओं से किया जाता है, इसमें एंटीबॉयोटिक और एंटीवायरल दवायें काम नहीं करती हैं।

कैसे बचें मेनिनजाइटिस से?

इससे बचाव के लिये हेल्दी लाइफ स्टाइल अपनायें, धूम्रपान छोड़ें, इससे पीड़ित व्यक्तियों से दूर रहें और वैक्सीनेशन करायें। वैक्सीनेशन से मेनिंजाइटिस के कुछ प्रकारों से बचा जा सकता है। आजकल मेनिंजाइटिस की रोकथाम के लिये ये वैक्सीन प्रयोग की जाती हैं-

– हेमोफिलिस इंफ्लूएंजा टाइप बी (एचआईबी) वैक्सीन।

– न्यूमोकोक्कल कॉन्जूगेट वैक्सीन।

– मेनिन्गोकोक्कल वैक्सीन।

वैक्सीन के अलावा पर्सनल हाइजीन की आदत भी काफी हद तक इससे बचाती है। यदि कोई व्यक्ति हाल में ही इसका शिकार हुआ है तो उसके क्लोज कॉन्टेक्ट में न आयें और न ही उसके साथ खाना-पीना और बर्तन शेयर करें।

नजरिया

इसका बैक्टीरियल टाइप सबसे घातक है। ऐसे में यदि इसके कोई भी लक्षण नजर आयें तो तुरन्त डाक्टर से मिलें जिससे इसका सही टाइप पता चल जाये। वायरल टाइप के लिये ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं लेकिन बैक्टीरियल टाइप की पुष्टि होते ही इसे गम्भीरता से लें और पीड़ित को अस्पताल में भर्ती करायें। इसमें जरा सी लापरवाही से मरीज की जान जा सकती है। ऐसे मरीज की केयर में लगे लोगों को चाहिये वे इसके पास बिना मास्क के न जायें और मरीज के रोज-मर्रा इस्तेमाल की वस्तुओं को भी प्रयोग न करें। जब मरीज ठीक होकर घर आ जाये तो उसे कुछ सप्ताह तक आराम करने दें और उससे क्लोज सम्पर्क न बनायें। यदि सम्भव हो तो इसका वैक्सीनेशन करायें विशेष रूप से बच्चों को तो अवश्य।

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