ओडिशाः कॉलेज की फीस भरने के लिए दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर हुई इंजीनियरिंग की छात्रा


हमारे देश में गरीबी के बहुत ही बुरे हाल है, ऐसे में एक ही कहावत जुबान पर आती है। गरीबी(Poverty) क्या ना कराए। बीत 26 जनवरी को निकली परेड (parade)में भी शिक्षा मिलने का सबको हक है इस बात की छवि देखने को मिली थी, लेकिन क्या सच में शिक्षा सबको मिल पा रही है? ये एक बड़ा सवाल है हमारे देश के ऊपर।ऐसी ही कुछ तस्वीर ओडिशा(Odisha) में देखने को मिली है। आज हम ओडिशा में रहने वाली रोजी की पढ़ाई को लेकर संघर्ष के बारे में बात करेंगे। रोजी ने अपने कड़ी मेहनत और लगन से इंजीनियरिंग(Engineering) की पढ़ाई तो कर ली, लेकिन फीस चुकाने में नाकाम रही तो कॉलेज ने बेचारी का डिप्‍लोमा(Diploma) ही रोक दिया। अपने डिप्लोमा को हाथ में पाने के लिए  अब रोजी  दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर है। वह रोजाना 207 रुपये के आधार पर मनरेगा(MANREGA) मजदूर की हैसियत से काम करती है, जिससे डिप्‍लोमा लेने के लिए वह पैसे जोड़ सके।

गोराडापिढ़ा गांव का दुखद कहानी

यह कहानी लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली है। ओडिशा में पुरी जिले के पिपली ब्‍लॉक के गोराडापिढ़ा गांव में रहने वाली रोजी ने विपरीत स्थितियों में रहने के बावजू  भी अपनी लगन व मेहनत से इंजीनियरिंग की पढ़ाई तो कर ली, लेकिन फीस नहीं चुका पाना उसके लिए एक विकट समस्‍या बन गई, जिस कारण कॉलेजवालों  ने उसे पढ़ाई का डिप्‍लोमा देने से इनकार कर दिया।

अब वह पिता के साथ मनरेगा मजदूर के तौर पर काम करती है, ताकि घर के खर्चे चलाने में उन्‍हें मदद दे सके और अपना डिप्‍लोमा लेने के लिए कॉलेज को फीस चुका कर अपनी  आगे की पढ़ाई जारी रख सके, जिससे आगे के भविष्‍य में उसे एक अच्‍छा करियर मिल सके।

इस सत्र में की पढ़ाई

रोजी ने एक प्राइवे कॉलेज से 2016-2019 सत्र में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करी थी। आपकों बता दे कि ये पढ़ाई रोजी ने सरकारी अनुदान की हेल्प से पूरी की थी, लेकिन हॉस्टल की फीस जमा करने के लिए उसके पास कुछ भी नहीं था। फीस भरने के लिए रोजी को 44000 रुपये की जरूरत है, जबकि उसके माता पिता के पास केवल 20000 रुपये ही हैं। रोजी ने कॉलेज वालों को भी  अपनी परेशानियों से अवगत कराया, लेकिन कॉलेज वालें मानने को तैयार नहीं है। इस समय रोजी मनरेगा स्कीम के तहत मजदूरी कर रही है, जिससे कॉलेज की फीस के पैसे वो इकट्ठा कर सके। ये पैसे चुका कर रोजी अपने आगे की पढ़ाई को जारी रखना चाहती है।रोजी को इस बात का भी काफी दुख है डिप्लोमा हाथ में आने से उसका  B.Tech में दाखिला नहीं हो पाया। 

रोजी के घर में उसकी  पांच बहने हैं और घर में कमाने वाले सिर्फ अकेले उसके पिता ही हैं, जो दिन रात मजदूरी करके घरवालों का पेट पालते हैं। एक बहन बीटेक कर रही है। दूसरी कक्षा 12 की छात्रा है। उसकी दो सबसे छोटी बहनें कक्षा 7 और कक्षा 5 में की छात्रा है। ऐसे में रोजी के पिता के लिए परिवार के खर्चों के साथ साथ अपनी पांचों बेटिंयों की पढ़ाई का खर्चा भी उठा पाना काफी मुश्किल हो रहा है। यही वजह है कि रोजी ने स्वयं भी इस काम में लगने का फैसला किया और बीते 20 दिनों से वह मनरेगा स्‍कीम के तहत कड़ी मेहनत कर  मिट्टी ढोने का काम कर रही है। इस मामले की मिलते ही वहां का स्‍थानीय प्रशासन भी कुछ एक्टिव हुआ है। देलांग ब्‍लॉग के वेल्‍फेयर एक्‍टेंशन ऑफिसर ने कहा कि वह इस मामले की जांच करेंगे। उन्‍होंने रोजी से मुलाकात कर बातचीत भी की, जिससे उन्हें रोजी का पक्ष जानने में भी मदद मिली

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