केसीआर धृतराष्ट्र मोड में, अपने बेटे को कुर्सी पर बिठाने की तैयारी में हैं

 


 यह अक्सर कहा जाता है, विशेष रूप से भारतीय राजनीतिक गलियारों में, कि संतान के लिए पिता का प्यार उसे अंधा कर देता है। भारत ने 1966 से इस अंधे प्रेम के परिणामों को देखा है, जब इंदिरा गांधी पहली बार सत्ता में आई थीं। अगर आज के दौर में देखा जाए तो कांग्रेस आज भी युवा राजकुमार गांधी के चक्कर में पड़ी हुई है। अब तेलंगाना के KCR भी इसी पुत्र मोह में फंस कर धृतराष्ट्र की तरह अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जा रहे हैं। वंशवाद की राजनीतिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, मुख्यमंत्री और टीआरएस के संस्थापक के चंद्रशेखर राव ने तेलंगाना राष्ट्र समिति के संरक्षक और अपने बेटे केटी रामाराव को सौंपने का फैसला किया हैं।

राज्य में राजनीतिक गलियारे इस खबर के कारण माहौल गरम है। एक वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री ने कहा, “हां, अगले मुख्यमंत्री केटीआर हैं।  यह ज्यादातर फरवरी में होगा।  वे अपने परिवार के भीतर चर्चा कर रहे हैं।  कैबिनेट में भी कई बदलाव होंगे।”

इस खबर पर टिप्पणी करते हुए, स्वास्थ्य मंत्री Etela Rajender ने कहा कि, “एक मौका है (सत्ता हस्तांतरण का), क्यों नहीं?  इसमें कुछ भी गलत नहीं है। हमारी सरकार में केटीआर द्वारा 99 प्रतिशत कार्यक्रमों की समीक्षा की जा रही है।  उन्होंने अपने पिता, मुख्यमंत्री की ओर से COVID-19 टीकाकरण कार्यक्रम में भी भाग लिया।”

यह ध्यान देने वाली बात है कि KCR के गिरते स्वास्थ्य ने KTR को और अधिक तेज़ी से उभरा है। COVID ​​-19 लॉकडाउन के बाद से मुख्यमंत्री सार्वजनिक जीवन से दूर हैं। भले ही वह एक युवा नेता हैं, लेकिन केटीआर राज्य सरकार में पहले से ही नम्बर दो पर है। उन्हें पहले से ही नगरपालिका प्रशासन और शहरी विकास, उद्योग और आईटी तथा वाणिज्य जैसे मंत्रिमंडल पद सौंप दिया गया था। केटीआर के साथ परामर्श के बाद ही रणनीतिक महत्व के सभी निर्णय किए जाते हैं। हालांकि, यह वंशवाद की खबर निराशाजनक है, लेकिन आश्चर्यजनक नहीं है।

पार्टी सूत्रों के अनुसार, सदस्यों के अंदर शुरू में उत्तराधिकार के मुद्दे पर रोष था और वे चाहते थे कि अगले विधानसभा चुनावों में केसीआर ही नेतृत्व करे।  हालांकि, अब कई लोग मानते हैं कि KTR का आगे बढ़ना स्वाभाविक है। इसके अलावा, उन्हें यह भी लगता है कि सत्ता में आने के बाद केटीआर राष्ट्रीय राजनीति पर ध्यान केंद्रित करेंगे।

इस पर टिप्पणी करते हुए, कांग्रेस प्रवक्ता डॉ श्रवण दसोजू ने केसीआर और केटीआर को “एक ही सिक्के के दो पहलू” कहा। उन्होंने कहा, “एक छोटा परिवार राज्य चला रहा है।  अगर सत्ता की शक्ति एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के पास चली जाए तो क्या फर्क पड़ता है?  लोग तानाशाही राजनीति को समाप्त करना चाहते हैं।  कम से कम, नए सीएम को लोगों की बात सुननी होगी और लोकतंत्र को मजबूत करना होगा। ”

इस बीच भाजपा ने परिवार से ही मुख्यमंत्री का चेहरा चुने जाने के बाद इस कदम की आलोचना की है।  भाजपा के पूर्व सांसद और वरिष्ठ नेता विवेक वेंकट स्वामी ने कहा, ” वैसे भी यह टीआरएस के लिए आखिरी कार्यकाल है। केसीआर को एक बात ध्यान में रखनी होगी कि उन्होंने तेलंगाना में दलित को सीएम बनाने का वादा किया था। अब, वह एक अपने ही परिवार से सीएम बना रहे हैं।”

अटकलें इस बात से भी लग रही है कि ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनावों में भाजपा के शानदार प्रदर्शन ने पार्टी को चिंतित कर दिया है। राज्य की राजनीति में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए, टीआरएस ने अब जल्दी से बदलाव करने का सहारा लिया है।

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