खाई और गहरी व जिन्ना पैदा


सन् 2020 को याद रखेंगी पीढ़ियां-4: सन् 2020 के 365 दिनों में भारत के टीवी चैनलों और मीडिया में खलनायक नंबर एक कौन था? कौन सी गाली सर्वाधिक हिट थी? देश की राजधानी दिल्ली में पानीपत की लड़ाई के मोहल्ले कौन से थे? भारत के प्रधानमंत्री ने वेशभूषा के हवाले किनकी तरफ इंगित किया? किनको दिल्ली में करंट लगाना था? यों सिलसिला छह साल से चला आ रहा है और घर-घर वहीं फैली बात हैं, जिससे नगर पालिका चुनाव हों या विधानसभा या लोकसभा का, हर चुनाव देशद्रोही बनाम देशभक्त, हिंदू बनाम मुस्लिम की पानीपत लड़ाई होता है। बावजूद इसके वर्ष 2020 पूर्ववर्ती वर्षों से अलग था। ऐसा हल्ले व नैरेटिव के पांच प्रसंगों से है। एक, कोई ढाई महीने नागरिकता कानून के खिलाफ बूढ़ी अम्माओं के शाहीन बाग प्रदर्शन से और दूसरे तबलीगी जमात पर वायरस का ठीकरा फोड़े जाने से। तीसरा कारण बिहार का चुनाव और चौथा हैदराबाद में हिंदू बब्बर शेर और मुस्लिम बब्बर शेर के चुनावी मुकाबले से। पांचवां प्रसंग किसान आंदोलन पर यह हल्ला कि अरे इनके बीच तो शाहीन बाग की उस बुढ़िया को देखो, देखो सरदार की पगड़ी के नीचे मुसलमान को, देखो खालिस्तानियों और पाकिस्तानियों के सांझे चुल्हे को! चीन के एजेंटों को!

तो इतिहास का बदला सन् 2020 में किस मुकाम पर? इतिहास की हिंदू बनाम मुस्लिम ग्रंथि पर जितना मैंने लिखा हैं शायद ही किसी ने लिखा होगा और मुस्लिम समाज को बदलने व हिंदू भावनाओं को समझने की नसीहत मैंने और ‘नया इंडिया’ ने, जिस बेबाकी से दी है शायद ही किसी ने दी होगी। तर्क के नाते इस दलील को भी माना जा सकता है कि हिंदुओं ने सदियों जलालत झेली तो मुसलमान यदि दस-बीस साल सत्ता से बेदखल रहे, हैसियत में रहे, जलालत की जिंदगी जीये तो कोई बात नहीं। लेकिन यदि शासन, सत्ता और राष्ट्र-राज्य ही फूट डालो-राज करो की प्रवृत्ति में अपने आपको ढाल ले तो अंत क्या होगा? संविधान, आधुनिक लोकतंत्र और भारत का हिंदूकरण एक बात है, इतिहास का बदला लेना एक बात है लेकिन भारत माता के घर में फूट डालो-राज करो और उसे पानीपत के मैदान में लगातार बांटे रखना भविष्य में कितने विभाजन बनवाएगा? क्या घर टूटेगा, बिखरेगा नहीं?

सन् 2020 के भारत नैरेटिव में कई दफा अंग्रेजों का वक्त याद हो आया। माना जाता है कि अंग्रेजों ने भारत माता के दो बेटों हिंदुओं और मुसलमानों को लड़वा कर, फूट डाल कर राज किया। बात कितनी सत्य है, यह विश्लेषण का मसला है। मैं हिंदू-मुस्लिम ग्रंथि इतिहासजन्य मानता हूं। अंग्रेजों के राज में भी स्वयंस्फूर्त फोड़ा था। उस पर फूट डालो, राज करो का अंग्रेज व्यवहार उनका राज करने का, सत्ता में बने रहने का कौशल था। यह तो हिंदुओं को, मुसलमानों को गांधी-नेहरू-जिन्ना को सोचना-समझना था कि आपस में लड़ने का, सत्ता के परस्पर साझे के बिना अंत नतीजा क्या होगा।

सो, मसला यह बूझने का, इस समझ का है कि फूट डालो-राज करो से आगे क्या? ऐसी चिंता अंग्रेजों को नहीं करनी थी। वे भारत में बसने के लिए नहीं थे। वे गुलामों पर राज करते हुए थे। जब जाने का वक्त आया तो पल में भारत को दो हिस्सों में बांट डाला। लेकिन नरेंद्र मोदी और हिंदुओं को, उनकी अगली पीढ़ियों को तो भारत में ही जीना मरना है तो फूट डालने की राज शैली से आने वाली पीढ़ियों को, पच्चीस-पचास साल बाद भारत किस शक्ल में मिलेगा? जब हर चुनाव और चौबीसों घंटे का हल्ला यदि पानीपत की लड़ाई है, देशभक्त बनाम टुकड़े-टुकड़े गैंग के देशद्रोहियों के लड़ने का युद्ध मैदान है तो दिलों के टुकड़े-टुकड़े कितने होंगे और घर बंटेगा या नहीं? दिलों के टुकड़ों से टुकड़े-टुकड़े होते हैं तभी तो आजादी के नारे लगते हैं। सचमुच त्रासद है, जो हिंदू समझ नहीं पा रहे हैं कि जब देश उनका है तो टुकड़े-टुकड़े गैंग वाला हल्ला देश में एकता बनाएगा या देश के टुकड़े करेगा?भारत को लगातार पानीपत का मैदान बनाए रखने से क्या सधेगा? क्या मुसलमान भारत से भाग जाएंगे? क्या मुसलमान हिंदू हो जाएंगे? क्या वे नरमदिल और आधुनिक हो जाएंगे? क्या इससे उनकी संख्या कम होगी? क्या भारत सौ टका हिंदू राष्ट्र हो जाएगा? जान लें हिंदू राष्ट्र बनने की घोषणा का कोई मतलब नहीं है। मोदी की हिंदू राजशाही में वैसा न हो सकना इसलिए नहीं है कि मुसलमान विरोध करेंगे, बल्कि इस तरह के काम की मोदी-शाह-संघ में हिम्मत ही नहीं है। उनका एकमेव मकसद खौफ पर पानीपत लड़ाई को लंबा खींचते हुए वोटों की फसल पका चुनाव-दर-चुनाव जीतना है।

विश्लेषण साल की समीक्षा से अधिक देश के स्थायी मसले की और जा रहा है। पर तभी सन् 2020 को समझें कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भविष्य की बबूल फसल का कैसा चौतरफा बीजारोपण है। वर्ष में बूढी अम्माओं के शाहीन बाग धरने और फिर दिल्ली की हिंसा के अनुभव के बाद मुसलमान के घर-घर, जो सोचा गया उसका सीधा परिणाम बिहार के सीमांचल इलाके में देखने को मिला। बिहार के चुनाव में तमाम तरह के समझदार मुसलमान, सेकुलर नेता इस ख्याल में थे कि मुस्लिम बहुल इलाके में राजद-कांग्रेस ही जीतेगी। ओवैसी की पार्टी कुछ वोट काट सकती है लेकिन जीत नहीं सकती है। लेकिन मुसलमानों ने कांग्रेस टिकट पर लगातार चुनाव जीतते आए मुस्लिम विधायकों को हराया और ओवैसी को जिन्ना बनाने के लिए उनके उम्मीदवारों को जिताया। राहुल गांधी-तेजस्वी नहीं औवेसी इसलिए ताकि मोदी-शाह के आगे ईंट का जवाब पत्थर से देने वाला नेता मुसलमानों की कमान संभाले।

तभी सन् 2020 नए मोहम्मद अली जिन्ना का जन्म है। हिंदू बुद्धि का कमाल देखिए कि बिहार में ओवैसी नेता बने तो अमित शाह ने हैदराबाद के लोकल नगरपालिका चुनाव में ताकत झोंक हिंदुओं को, मुसलमानों को मैसेज दिया कि कबूल है इस जिन्ना से लड़ाई और इसे उसकी मांद में ही हराएंगे। घमासान हुआ। पूरे देश ने कान फोड़ू अंदाज में पानीपत की हैदराबाद लड़ाई का आंखों देखा हाल सुना।

सोचें इस सबसे भारत का क्या बन रहा है, क्या बनेगा? 2019 का लोकसभा चुनाव भी पानीपत की लड़ाई था तो सन् 2020 में दिल्ली का चुनाव भी पानीपत की लड़ाई व बिहार विधानसभा और हैदराबाद नगरपालिका का चुनाव भी पानीपत की लड़ाई! भारत के 138 करोड़ लोग बार-बार लगातार फूट डालो-राज करो की राजशैली में यदि दिल-दिमाग में एक-दूसरे के घनघोर दुश्मन बनते ही जाएंगे तो उससे आगे किसे सर्वाधिक फायदा होगा? क्या ओवैसी और उनकी पार्टी को नहीं? छह वर्षों में हिंदू राजशाही यदि फली फूली है तो एक शहर का मुस्लिम नेता और उसकी पार्टी भी 1937 की उस मुस्लिम लीग की तरह बढ़ती हुई है, जो कांग्रेस के आगे मुस्लिम नुमाइंदगी के लिए भी तब छटपटाए हुए थी। ओवैसी और उनकी पार्टी छह सालों में हैदराबाद से निकल महाराष्ट्र के मुसलमानों में जगह बना बैठी है तो 2020 में बिहार का सीमांचल उसका गढ़ बना और आश्चर्य नहीं होगा जो नए साल बंगाल में वह सूबाई ताकत लिए हुए हो। उसके बाद उत्तर प्रदेश का वैसे ही पड़ाव जैसे 1937 में यूनाइटेड प्रोविंस में कम ही सही मुस्लिम लीग ने कांग्रेस के आगे बनाया था।

तभी सन् 2020 इतिहास की पुनरावृत्ति का खटका बना कर विदा होता हुआ है। 1937 में राष्ट्रवादी मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना कांग्रेस के आगे गिड़गिड़ाते हुए थे कि हमें सत्ता में साझा चाहिए। हमें अछूत न मानो, हम पर विलय की शर्त न थोपो, हमें अपनी संख्या-सीटों के अनुपात में चुल्हे का साझेदार बना लो हम मान जाएंगे। लेकिन कांग्रेस, नेहरू, गोविंद वल्लभ पंत सभी तात्कालिक रूतबे, घमंड में व्यवहार करते हुए थे। नतीजतन देखते-देखते दस सालों में सत्ता की लड़ाई से पैदा मनोवैज्ञानिक खाई वह विभाजन करवा बैठी, जिसकी कल्पना सचमुच 1937 में जिन्ना ने भी नहीं की थी!

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