जबसे MBS सत्ता में आये हैं, तबसे सऊदी अब कूटनीतिक skills को मजबूत करने में जुटा है


इस्लामिक दुनिया में शुरू से ही अरब देशों और खासकर सऊदी अरब का सबसे ज़्यादा प्रभाव रहा है। वर्ष 1960 में OPEC की स्थापना के साथ ही तेल की बढ़ती मांग के दम पर सऊदी अरब की GDP तेज रफ़्तार से बढ़ने लगी। वर्ष 1973 में जहां इस देश की GDP सिर्फ 15 बिलियन डॉलर थी, तो वहीं वर्ष 1980 तक यह 184 बिलियन डॉलर हो गयी। इस दौरान सऊदी अरब की छवि सिर्फ तेल बेचने वाले एक देश के तौर पर स्थापित हुई। इस दौरान सऊदी अरब ने इस्लामिक जगत को प्रभावित करने वाले कई वैश्विक मुद्दों, जिनमें फिलिस्तीन और कश्मीर सबसे अहम थे, उसको ज़ोर शोर से उठाया! तेल के दम पर ही वैश्विक राजनीति पर सऊदी अरब ने दबदबा दिखाना शुरू किया। वर्ष 1973 में अमेरिका पर OPEC द्वारा लगाया गया “तेल प्रतिबंध” इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वर्ष 1973 में जब अरब देशों और इज़रायल के बीच युद्ध हुआ था, तो अमेरिका ने इज़रायल की सहायता की थी, जिससे नाराज़ होकर सऊदी अरब के नेतृत्व में ही OPEC ने अमेरिका को तेल देने से ही साफ़ मना कर दिया था! सऊदी अरब तेल के दम पर दुनिया का शहँशाह बन चुका था, जो सुपरपावर अमेरिका को भी अपने सामने झुका सकता था।

हालांकि, सऊदी अरब की शौहरत और रुतबे का एक ही आधार था और वो था तेल! 21वीं सदी आते-आते अमेरिका भी तेल के मामले में आत्मनिर्भर होने लगा और इसके साथ ही तेल बाज़ार पर सऊदी अरब का प्रभाव भी कम होने लगा। इस सदी में विकसित दुनिया हरित ऊर्जा की बात करने लगी, जिसके कारण Saudi Arab को अपने भविष्य की चिंता होने लगी। जो शौहरत उसने तेल के दम पर हासिल की थी, वही तेल अपनी कीमत खोने जा रहा था। ऐसे में सऊदी की सत्ता के गलियारों में उदय होता है सऊदी अरब के मौजूदा क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का, जिन्हें उनके परिवार और पिता द्वारा कई प्रकार के तिगडम लगाकर इस कुर्सी तक पहुंचाया गया है। उन्होंने सऊदी के सामने खड़ी इस विशाल समस्या को पहचाना और वर्ष 2016 में अपनी विज़न 2030 स्कीम को लॉंच किया, जिसका एक मात्र मकसद था सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था को तेल से दूर लेकर जाना और सऊदी अरब को एक बिजनेस हब के तौर पर विकसित करना!

मोहम्मद बिन सलमान को आज सऊदी अरब का अघोषित शासक माना जाता है, जो आज अपने देश की स्पष्ट और प्रभावी कूटनीति को आगे बढ़ा रहे हैं और खास बात यह है कि उसके केंद्र में “तेल” नहीं है। सऊदी अरब आज खुलकर ऐसे दांव-पेच खेल रहा है, जिससे हर दिन यह सुनिश्चित होता जा रहा है कि तेल की मांग में भारी गिरावट के बाद भी Saudi Arab का विश्व में वही स्थान बरकरार रहेगा, जो अभी देखने को मिलता है। MBS के नेतृत्व में Saudi Arab भारत, चीन और अब रूस जैसे देशों के साथ अपनी अपारंपरिक दोस्ती को और मजबूत करता जा रहा है और इसके पीछे MBS की शानदार कूटनीति का ही कमाल है।

उदाहरण के लिए भारत के साथ सऊदी अरब की दोस्ती ही ले लीजिये! वर्ष 2019 में PM मोदी अक्टूबर महीने में सऊदी अरब पहुंचे थे और MBS के विज़न 2030 को अपना भरपूर समर्थन दिया था। उसी दौरान भारत और Saudi Arab एक दूसरे के Strategic partners बने थे और तब सऊदी अरब ने भारत में 100 बिलियन डॉलर के निवेश करने का भी ऐलान किया था। MBS के नेतृत्व में भारत-सऊदी अरब अब बस व्यापारी नहीं रहे हैं, बल्कि रणनीतिक साझेदार बन चुके हैं। यही कारण है कि MBS अब पाकिस्तान को दरकिनार कर भारत के साथ अपने रिश्ते और यहाँ तक कि सैन्य रिश्ते मजबूत करते जा रहे हैं। पाकिस्तान को डंप करना सऊदी अरब का एक बड़ा कूटनीतिक कदम था, जिसे MBS ने कर दिखाया।

इसी प्रकार सऊदी अरब के नेतृत्व में ही अरब देश इज़रायल के साथ अपने रिश्ते समान्य करने को लेकर राज़ी हुए हैं। अपने सबसे कट्टर दुश्मन और अपने सबसे बड़े खतरे ईरान को ठिकाने लगाने के लिए MBS इज़रायल को गले लगाने से भी पीछे नहीं हटे! उनके इस फैसले का उनके परिवार तक में विरोध हुआ, लेकिन वो पीछे नहीं हटे। Abraham Accords को साइन करने के बाद ना सिर्फ UAE को अब अमेरिका से घातक एफ़-35 विमान मिलने वाले हैं, बल्कि अरब देशों के लिए अधिक व्यापारिक अवसर भी उपलब्ध होने वाले हैं।

MBS के नेतृत्व में ही सऊदी अरब चीन और अमेरिका के बीच चल रहे शीत युद्ध के दौरान अपने देश को बेहतर स्थिति में बनाए रखने में सफल हुए हैं। जब सऊदी अरब को अमेरिका के ट्रम्प प्रशासन की ओर से मुश्किलों का सामना करना पड़ा, तो Saudi Arab ने बड़ी ही चालाकी से अपने यहाँ चीन को बुलाकर अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम को आगे बढ़ाने का बड़ा फैसला ले लिया! पिछले वर्ष अगस्त महीने में आई एक रिपोर्ट के अनुसार चीन की सहायता से सऊदी अरब ने अपने यहाँ Uranium ore से Uranium yellow cake बनाने के लिए एक facility को स्थापित किया था, जिसके बाद अमेरिका में इसके प्रति खासा चिंता प्रकट की गयी। हालांकि, उसके बाद अमेरिका ने ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम के खिलाफ कई बड़े कदम उठाए हैं, जिसने दोबारा Saudi Arab को अमेरिका की तरफ धकेला है। इसमें कमांडर सुलेमानी और ईरान के टॉप न्यूक्लियर वैज्ञानिक की हत्या शामिल है। इस प्रकार Saudi Arab ने अमेरिका और चीन के बीच विवाद को अपने लिए अवसर में परिवर्तित करने की भरपूर कोशिश की है।

इसी कड़ी में अब सऊदी अरब रूस के साथ भी अपने रिश्ते मजबूत करने की कोशिशों में जुटा है और उसके बल पर वह रूस के दोस्त ईरान के लिए और मुश्किलें पैदा करने की फिराक में है। हाल ही में सऊदी अरब ने OPEC प्लस के तहत रूस के साथ एक समझौता किया है, जिसके तहत उसने प्रति दिन करीब 1 मिलियन बैरल तेल कम उत्पादन करने का फैसला लिया है और रूस को अपनी उत्पादकता बढ़ाने को कहा है, जिसका रूस को बड़ा आर्थिक फायदा होगा! इस प्रकार सऊदी अरब अब रूस को अपने साथ लेकर आने की कोशिश कर रहा है ताकि उसके दुश्मन ईरान के लिए वह और मुश्किलें खड़ी कर सके!

हाल ही में Saudi Arab ने क़तर के साथ पिछले तीन सालों से जारी विवाद और blockade को भी समाप्त करने का फैसला लिया है और क़तर के साथ दोबारा अपने कूटनीतिक और आर्थिक रिश्ते स्थापित करने का ऐलान किया है। यह एक ऐसा फैसला है, जिसने दोबारा ईरान को बड़ा झटका दिया है। सऊदी अरब तुर्की को नुकसान पहुंचाने के लिए भी उसके खिलाफ अघोषित व्यापारिक प्रतिबंधों का ऐलान कर चुका है, जिसका मोरक्को और कई अरब देशों ने भी अनुसरण किया है।

इन फैसलों से साफ़ है कि सऊदी अरब अब MBS के नेतृत्व में कूटनीति का champion बन चुका है, जिसके जरिये अब वह वैश्विक ताकतों के साथ अपने रिश्तों को बेहतर करता जा रहा है, ताकि उसके लिए व्यापारिक अवसरों की कोई कमी ना हो! Saudi Arab अब तेल का बस एक व्यापारी नहीं रहा है, बल्कि आगामी दशकों तक में एक बड़े व्यापरिक केंद्र के तौर पर अपनी पहचाने बनाने की कोशिशों में सफ़ल होता जा रहा है।

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