कृषि कानूनों का धन्यवाद: कर्नाटक में किसानों को अपनी फसलों पर मिले MSP से ज्यादा दाम

  


किसानों के मुद्दे पर देश में लगातार अफवाहें फैलाई जा रही हैं। तीन नए कृषि कानूनों को लेकर कुछ खालिस्तानी और महत्वाकांक्षी राजनीतिक दलो ने किसानों को भड़का दिया है कि किसानों से MSP छिन जाएगी और मंडी में उन्हें लाभ भी कम होगा।

जबकि कृषि कानूनों के बाद स्थितियां विपरीत हो गई हैं। किसानों को इससे फायदा हो रहा है। कर्नाटक के किसानों को धान की फसल में MSP से ज्यादा दाम मिला है जिससे उनके चेहरे खिल गए हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति हिमाचल की भी थी, जबकि लोगों को बरगलाने की नौटंकी विपक्ष द्वारा जारी है।

खबरों के मुताबिक रिलायंस इंडस्ट्रीज की सहयोगी कंपनी रिलायंस रिटेल लिमिटेड ने सिंधनूर स्थित एग्रो कंपनी के जरिये कर्नाटक के 1,100 किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से अधिक कीमत पर एक हजार क्विंटल धान खरीदने के लिए एक समझौते पर दस्तखत कर लिए हैं। दिलचस्प बात है जिस MSP एक्ट को लेकर दिल्ली की सीमाओं पर विरोध के नाम पर उत्पात मचाया जा रहा है, उसी MSP एक्ट में संशोधन के बाद कंपनी और किसानों के बीच ये सहज डील हुई है।

इस पूरे मुद्दे पर कई तरह के सवालों और उहापोह के बीच रिलायंस के अधिकारियों ने खुद इस डील की बातों को स्वीकारा है और किसानों के हित में कदम उठाने की बात कही है। कंपनी के एक अधिकारी ने बताया, “रिलायंस ने कर्नाटक के रायचूर जिले में सिंधनूर तालुक के किसानों से धान (सोना मंसूरी वैरायटी) की 1000 क्विंटल की खरीद कर बड़ी राहत दी है।कर्नाटक में MSP एक्ट में संशोधन के बाद किसी बड़ी कंपनी और किसानों के बीच पहली बार इस तरह की डील हुई है।”

खास बात ये है कि सरकार 1868 रुपए प्रति क्विंटल पर देती है जबकि रिलायंस ने किसानों को 1950 रुपए प्रति क्विंटल देने की डील की है।ये बेहद ही अजीब बात है कि दिल्ली की सीमाओं पर पंजाब के किसानों का अराजकतावादी आंदोलन तीन कृषि कानूनों के मुद्दे पर अभी भी जारी ही है।

कुछ लोगों द्वारा किसानों को केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ भड़का दिया गया है कि MSP खत्म हो जाएगी और किसानों को मंडी में कुछ भी बेचने को नहीं मिलेगा। अपितु यथार्थ अब सामने आ रहा है और किसानों का फायदा प्रतिदिन देखने को मिल रहा है।
किसान के आंदोलन से इतर हिमाचल के सेब की फसल वाले किसान को लाभ हो रहा है, और कुछ वैसी ही स्थिति कर्नाटक से भी सामने आई है जिसके चलते लोग किसानों के आंदोलन के मुद्दे को तवज्जो नहीं दे रहे हैं। पहले ही ये आंदोलन अपनी अराजकता के कारण लोगों को चुभ रहा है।

ऐसे में इस तरह की सकारात्मक खबरें इन किसानों की छवि पर दिन-ब-दिन दाग लगाती जा रही है। इन तथाकथित किसानों और खालिस्तानी समर्थकों के लिए अब ये उचित होगा कि वो आंदोलन खत्म करें क्योंकि उनकी विश्वसनीयता का ढोल फट रहा है।

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