PM मोदी के बंगाली Fans ने “जय श्री राम” के नारों से ममता बनर्जी को किया बेचैन!

 


अपनी राजनीतिक कब्र गाजे बाजे सहित कैसे खुदवानी है, यह कोई ममता बनर्जी से सीखे। एक बार फिर हिन्दू धर्म के प्रति अपनी विकृत सोच को जगजाहिर करते हुए ममता बनर्जी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिवस के 125वें वर्षगांठ के अवसर पर केवल इसलिए व्याख्यान देने से मना कर दिया, क्योंकि उनके मंच पर आने से पहले जय श्री राम के नारे लगाए गए थे।

23 जनवरी को नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्म को 124 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में नेताजी के जन्म के 125 वें वर्षगांठ के प्रारंभ हेतु कोलकाता में विक्टोरिया मेमोरियल के समक्ष एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित केंद्र सरकार और बंगाल सरकार के कई मंत्री एवं अफसर शामिल हुए।

इसी बीच ममता बनर्जी से जब मंच पर आकर जनता को संबोधित करने को कहा गया, तो उनके मंच पर जाने से पहले सभा स्थल पर उपस्थित जनता के बीच में कुछ लोगों ने जय श्री राम के नारे लगाए। इससे ममता इतनी आगबबूला हुई कि उन्होंने मंच पर आकर बोला, “सरकारी कार्यक्रम को राजनीतिक कार्यक्रम बना दिया गया है।इस तरह से किसी का अपमान करना ठीक नहीं है। ममता ने कहा कि सरकार के कार्यक्रम की गरिमा होनी चाहिए। यह कोई राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है। आपको किसी को आमंत्रित करने के बाद उसका अपमान करना शोभा नहीं देता है। विरोध के रूप में मैं कुछ भी नहीं बोलूंगी” 

कृपया ममता बनर्जी ये बताने का कष्ट करेंगी कि जय श्री राम से किसका किस प्रकार से अपमान हुआ? हालांकि ममता बनर्जी के लिए श्रीराम का महिमामंडन करना किसी महापाप से कम नहीं था, लेकिन जो उन्होंने नेताजी के जन्मदिन की वर्षगांठ पर कहा, उससे उन्होंने न सिर्फ नेताजी की विरासत का अपमान किया है, बल्कि अपनी ही सत्ता के अंत को और प्रबल बना दिया है।

सही कहा है किसी ने, जब नाश मनुज पर छाता है, विवेक पहले मर जाता है। ममता बनर्जी ने अपनी ओछी हरकत से न सिर्फ नेताजी के जन्म के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह का माहौल खराब किया, बल्कि अपने चुनावी अभियान की भी मिट्टी पलीद की। उनके चुनाव संयोजक प्रशांत किशोर इस बात को सिद्ध करने के लिए पूरी कोशिश कर रहे थे कि ममता बनर्जी कहीं से भी हिन्दू विरोधी नहीं है, लेकिन अपने इस कृत्य से ममता ने उनके सारे किये कराए पर पानी फेर दिया। इससे भाजपा को ममता बनर्जी को घेरने के लिए एक बेहद सुनहरा अवसर मिलेगा, क्योंकि अल्पसंख्यक वोटों पर पहले ही ममता बनर्जी को ओवैसी की चुनौती का सामना करना पड़ेगा

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