नेहरू, इंदिरा, राहुल, सोनिया, मनमोहन और PM मोदी: प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब में किसके लिए क्या कहा!


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 कांग्रेस का पार्टी का चाल, चरित्र और चेहरा अब प्रत्येक भारतीय को पता है, बस कभी-कभी कुछ काम ऐसे प्रसंग हो जाते हैं जो उस पर्दे के पीछे छिपे सर्वविदित सत्य को उजागर कर देते हैं। पूर्व राष्ट्रपति और कांग्रेस नेता भारत रत्न प्रणब मुखर्जी की किताब “द प्रेसीडेंशियल ईयर्य” में कुछ ऐसे ही कटु सत्य सामने आए है जिससे पार्टी की नीतियों का कच्चा चिट्ठा खुल गया है। प्रणब दा ने पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा, सोनिया, मनमोहन और राहुल गांधी के नेतृत्व तक का पुलिंदा सबके सामने रख दिया है।

काफी विवादों के बाद आखिरकार प्रणब मुखर्जी की किताब “द प्रेसीडेंशियल ईयर्य” प्रकाशित हो गई है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर देश के कई अहम किस्सों का जिक्र है जिसके लिए उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व की ही कड़ी आलोचना की है। उन्होंने पूर्व और प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की नीतियों को उजागर कर एक ऐसी बहस को शुरू किया है जो कि कांग्रेस के लिए मुश्किल भरी होगी।

प्रणब दा ने अपनी किताब में सबसे पहले पंडित नेहरू को ही आड़े हाथों लिया और बताया कि नेहरू ने नेपाल को भारत में शामिल नहीं होने दिया। उन्होंने लिखा, “राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह ने नेहरू को यह प्रस्ताव दिया था कि नेपाल का भारत में विलय कर उसे एक प्रांत बना दिया जाए, मगर तब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इस प्रस्ताव को ठुकरा कर दिया था।”

उन्होंने आगे लिखा है कि अगर इंदिरा गांधी नेहरू के स्थान पर होतीं तो इस अवसर को जाने नहीं देतीं जैसे उन्होंने सिक्किम के साथ किया था।” सभी को पता है कि नेहरू से ज्यादा प्रणब दा इंदिरा के प्रशंसक थे और ये उनके राजनीतिक जीवन के लिए हमेशा ही सकारात्मक रहा।

सर्वविदित है कि प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री बनने की कसक हमेशा ही अपने मन में लिए हुए थे, 1984 से लेकर 1991 और फिर 2004 में हर बार उन्हें नकार दिया गया। विश्लेषक मानते हैं कि यही उनकी सोनिया से नाराजगी की असल वजह थी। सोनिया गांधी को लेकर प्रणब दा ने सबसे तीखे प्रहार किए हैं।

उन्होंने 2014 में पार्टी की हार और सोनिया के निर्णयों को लेकर लिखा, “मुझे लगता है कि संकट के समय पार्टी नेतृत्व को अलग दृष्टिकोण से आगे आना चाहिए। अगर मैं सरकार में वित्त मंत्री के तौर पर काम जारी रखता, तो मैं गठबंधन में ममता बनर्जी का रहना सुनिश्चित करता। इसी तरह महाराष्ट्र को भी बुरी तरह संभाला गया। इसकी एक वजह सोनिया गांधी की तरफ से लिए गए फैसले भी थे।मैं राज्य में विलासराव देशमुख जैसे मजबूत नेता की कमी के चलते शिवराज पाटिल या सुशील कुमार शिंदे को वापस लाता।”

इसके साथ ही उन्होंने आंध्र प्रदेश के विभाजन और तेलंगाना के गठन को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की नीतियों की आलोचना करते हुए पार्टी अध्यक्षा सोनिया गांधी को भी आईना दिखाया है। उन्होंने लिखा, “मुझे नहीं लगता कि मैं तेलंगाना राज्य के गठन को मंजूरी देता। मुझे पूरा भरोसा है कि सक्रिय राजनीति में मेरी मौजूदगी से यह सुनिश्चित हो जाता कि कांग्रेस को वैसी मार न पड़ती, जैसी उसे 2014 लोकसभा चुनाव में झेलनी पड़ी।”

प्रणब मुखर्जी ने डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को लेकर कहा, “डॉक्टर सिंह को इस पद की पेशकश सोनिया गांधी ने की थी, जिन्हें कांग्रेस संसदीय दल और संप्रग (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) के अन्य घटक दलों ने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में चुना था, लेकिन उन्होंने (सोनिया) इस पेशकश को ठुकरा दिया था।

जबकि मोदी 2014 में भाजपा की ऐतिहासिक जीत का नेतृत्व कर प्रधानमंत्री पद के लिए जनता की पसंद बने। वह मूल रूप से राजनीतिज्ञ हैं और जिन्हें भाजपा ने पार्टी के चुनाव अभियान में जाने से पहले ही प्रधानमंत्री पद के लिए अपना उम्मीदवार बनाया। वह उस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री थे और उनकी छवि जनता को भा गई। उन्होंने प्रधानमंत्री का पद अर्जित किया है।”

प्रणब मुखर्जी ने अपनि किताब में राहुल गांधी का जिक्र तो नहीं किया है, लेकिन जिस तरह से कांग्रेस ने 2014 और 2019 में राहुल की सक्रियता के बीच पार्टी की हार हुई उसके लिए उन्होने पार्टी के प्रदर्शन पर नाराजगी जाहिर की है। साफ है कि वो भी राहुल के नेतृत्व से खासा खुश नहीं थे जिसके चलते उन्होंने ये तक कह दिया, “पार्टी एक करिश्माई नेतृत्व की कमी से जूझ रही है।” इस बयान से उनका निशाना कांग्रेस के भावी अध्यक्ष राहुल गांधी पर ही था।

प्रणब मुखर्जी ने जिस तरह से अपनी किताब में इतनी विवादित बातों का जिक्र करके पार्टी की नीतियों का उल्लेख किया है। उससे पार्टी भी सदमे में है। पार्टी ने तय किया है कि वो इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोलेगी लेकिन प्रणब दा के इन संस्मरणों ने गांधी परिवार समेत पूरी कांग्रेस पार्टी के राजनीतिक भविष्य को और अधिक मुसीबत में ही डाला है क्योंकि कांग्रेस का वर्तमान अच्छा नहीं चल रहा है और बीजेपी को ऐसे समय में प्रणब दा की किताब के जरिए कांग्रेस पर हमला बोलने के लिए कई मुद्दे मिल गए हैं।

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