एक चीनी एजेंट को बाइडन ने UN में किया नियुक्त, भारत के UNSC सदस्यता की राह होगी मुश्किल

 


अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन ने जब से सत्ता संभाला है तब से ही भारत को बुरी खबरे ही मिल रही हैं। नई खबर में बाइडन ने जिसे अपना संयुक्त राष्ट्र का राजदूत चुना है वह, पहले तो भारत की UNSC में स्थाई सदस्यता पर ही सवाल उठा रहीं है और दूसरी बात ये कि उन्हें चीन के बड़े समर्थक के रूप में जाना जाता है। यानि संयुक्त राष्ट्र में आने वाले समय में भारत के लिए और समस्या खड़ी हो सकती है।

दरअसल, बाइडन प्रशासन द्वारा नामित राजदूत लिंडा थॉमस-ग्रीनफील्ड ने बुधवार को भारत के लिए सुरक्षा परिषद(UNSC) का स्थायी सदस्य होने का खुला समर्थन न करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर विचार किया जा रहा है। ध्यान देने वाली बात यह है कि पूर्व के तीन अमेरिकी प्रशासन, जॉर्ज डब्ल्यू बुश, बराक ओबामा और डोनाल्ड ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के स्थायी सदस्य बनने का समर्थन किया था।

जो बाइडन द्वारा  संयुक्त राष्ट्र के लिए नामित राजदूत लिंडा थॉमस-ग्रीनफील्ड ने कहा कि सुरक्षा परिषद (UNSC) की स्थायी सदस्यता के लिए भारत का दावा अभी ‘चर्चा का विषय’ है। थॉमस-ग्रीनफील्ड का बयान तब आया जब पिछले साल अपनी चुनावी अभियान के दौरान ही जो बाइडन  ने भारत की स्थायी सदस्यता बोली के लिए अमेरिका के समर्थन की पुष्टि की थी। पिछले वर्ष के अगस्त में भारतीय-अमेरिकियों पर बाइडन कैम्पेन के पॉलिसी डॉक्यूमेंट में कहा गया था कि, “विश्व मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका को स्वीकार करते हुए, ओबामा-बाइडन प्रशासन ने औपचारिक रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता के लिए अमेरिकी समर्थन की घोषणा की है।’’

सीनेट की विदेश संबंध समिति के समक्ष सुनवाई के दौरान, ओरेगन के सीनेटर जेफ मर्कले ने थॉमस-ग्रीनफील्ड से पूछा कि क्या भारत, जर्मनी, जापान, यूएनएससी के स्थायी सदस्य होने चाहिए। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए थॉमस-ग्रीनफील्ड ने कहा कि यह विषय मजबूत तर्कों के साथ अभी चर्चा का विषय है। यानि स्पष्ट है कि वे भारत की स्थाई सदस्यता का समर्थन नहीं करती हैं। बता दें कि इटली, पाकिस्तान, मैक्सिको और मिस्र जैसे देशों के कॉफी क्लब ने भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील की स्थायी सदस्यता का विरोध किया है।

हालाँकि, जिस तरह से जो बाइडन डोनाल्ड ट्रंप के फैसलों को पलट रहे हैं उससे भारत विरोधी नामों को बाइडन प्रशासन में स्थान मिलने की आशंका तो थी लेकिन इतने भी विरोधी होने की उम्मीद नहीं थी। ग्रीनफील्ड की समस्या सिर्फ भारत की UNSC में स्थाई सदस्यता से ही नहीं है बल्कि उनके चीन समर्थक होने से भी है।

अफ्रीका में चीन की रणनीति पर उनकी पिछली टिप्पणियों को देखा जाये तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि वह किस तरह चीनी रंग में रंगी हुई है। कुछ बयान तो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा वित्त पोषित कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट में दिया गया था। थॉमस-ग्रीनफील्ड ने सवाना स्टेट यूनिवर्सिटी की कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट की पांचवीं वर्षगांठ पर आयोजित भाषण में “चीन-अमेरिका-अफ्रीका संबंध” पर भाषण दिया था। हालाँकि भाषण बहुत आशावादी था, लेकिन अफ्रीका में चीन की आक्रामक नीतियों पर उन्होंने उस समय पर्दा डाला जब विश्व चीन की कई अत्याचारी नीतियों को उजागर करने की कोशिश कर रहा था।

उन्होंने बीजिंग के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का हवाला देते हुए अफ्रीकी आर्थिक और यहां तक ​​कि सांस्कृतिक जीवन के सभी पहलुओं में चीन के विस्तार का उल्लेख किया परन्तु उसके नकारात्मक प्रभाव को नहीं बताया। उन्होंने ट्रम्प प्रशासन की आलोचना की, लेकिन शी जिनपिंग के अत्याचारों को भूल गयी। थॉमस-ग्रीनफ़ील्ड अफ्रीका में बीजिंग के ऋण-जाल कूटनीति पर तो दूसरों को ही दोषी ठहरा दिया।

यानि देखा जाये तो संयुक्त राष्ट्र में भारत के लिए दोहरी मुश्किलें खड़ी हो सकती है। पहला तो स्थाई सदस्यता पर वीटो वाले देश का समर्थन गया और दूसरा चीन के समर्थक अमेरिकी राजदूत के आने से उसकी भारत विरोधी गतिविधियों को और बल मिलेगा। ऐसे में भारत को भी कूटनीतिक चाल चलनी होगी जिससे इस समस्या का हल निकला जा सके। आज के समय में भारत का विश्व में जो स्थान था, वैसी स्थिति में UNSC में स्थाई सदस्यता होना आवश्यक है और भारत को इसके लिए हरसंभव कोशिश करनी चाहिए।

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