इंडिपेंडेंट पैनल फॉर पैन्डेमिक प्रिपेयर्डनेस एंड रिस्पॉन्स ने बताया कैसे चीन और WHO ने दुनिया को किया बर्बाद

  


कोरोनावायरस जैसी महामारी को समय पर कंट्रोल न कर पाने और इस मसले को दुनिया से छिपा कर रखने को लेकर WHO और चीन दोनों की खूब आलोचना होती है, लेकिन अब उनकी इन आलोचनाओं पर मई 2020 में WHO द्वारा ही बनाई गई एक स्वतंत्र संस्था इंडिपेंडेंट पैनल फॉर पैन्डेमिक प्रिपेयर्डनेस एंड रिस्पॉन्स ने अपना आधिकारिक ठप्पा भी लगा दिया है। हम आपको अपनी रिपोर्ट्स में पहले ही बता चुके हैं कि किस तरह WHO के भ्रष्ट तंत्र ने चीन के साथ मिलकर पूरी दुनिया के साथ एक बड़ा खिलवाड़ किया है।

कोरोना के चीन से उपजने को लेकर WHO लगातार चीन को संरक्षण देता रहा है। बीमारी और वायरस को उसी देश के नाम से जोड़कर रखा जाता है, लेकिन इस मुद्दे पर WHO हमेशा चीन को संरक्षण देते हुए अन्य देशों के साथ भेदभाव करता रहा है क्योंकि WHO ने इस मामले में कोरोना की उपज और भौगोलिक स्थिति को सिरे से ही नजरंदाज कर दिया है, जो कि उसका बेहद ही आपत्तिजनक रवैया है।

WHO की स्वतंत्र कमेटी इंडिपेंडेंट पैनल फॉर पैन्डेमिक प्रिपेयर्डनेस एंड रिस्पॉन्स के मुताबिक चीन और WHO ने कोरोनावायरस को कंट्रोल करने के मामले में बेहद ही ढुलमुल रवैया अपनाया है, और सख्त समेत किसी भी तरह के कारगर फैसले लिए ही नहीं। महामारी के नियंत्रण को लेकर बनी मई 2020 की स्वतंत्र कमेटी ने बताया है कि अगर WHO और चीन इस मुद्दे पर पहले ही कदम उठाते और लोगों को इस बारे में अवगत कराते, तो शायद ये इतनी बड़ी महामारी बनती ही नहीं। इस मामले की दोनों ओर से सख्त जांच की जा सकती थी जो कि नहीं हुई।

इसके अलावा 18 जनवरी की एक रिपोर्ट के मुताबिक स्विस आधारित कमेटी ने स्वास्थ्य से जुड़ी चेतावनियों की नीतियों को बदलने पर जोर दिया है, और कहा कि वर्तमान नीतियां इस स्थिति से निपटने में और उद्देश्यों की पूर्ति में ज्यादा कारगर नहीं हैं। सीएनएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक पैनल इस बात पर पूर्ण रूप से सहमत हो गया है कि सामाजिक स्वास्थ्य व्यवस्था के अन्य कड़े नियमों को जनवरी 2021 से चीन में स्थानीय और राष्ट्रीय अधिकारियों द्वारा लागू किया जाएगा।

इस बात में अब कोई शक नहीं है कि अकेले चीन ने ही दुनिया को इस कोरोनावायरस जैसी वैश्विक महामारी में नहीं घसीटा है, बल्कि इस पूरे प्रकरण में WHO की भी विशेष भूमिका है। प्रारंभिक जांच इस बात का साफ संकेत देने लगी हैं कि जो कदम को उठाने चाहिए थे, वो उसने कोरोना के इस मामले में उठाए ही नहीं।

WHO की ढुलमुल नीति का पता इसी बात से चलता है कि उसने 2020 में कोरोना को 22 जनवरी तक कोई आपातकालीन बैठक तक नहीं बुलाई थी। साथी ही इस मुद्दे को वैश्विक महामारी मानने के मुद्दे पर भी WHO ने बेहद अधिक समय लगाया था। कमेटी इस बात को लेकर आश्चर्य में है कि ऐसा क्यों किया गया। यूके के पूर्व सचिव और पेंशन से जुड़े कार्यों के प्रमुख डंकन स्मिथ ने कोरोनायरस को लेकर बताया कि चीन ने कोविड-19 की इस महामारी को छिपाकर एक नीच काम किया है। अमेरिका ने आरोप लगाया कि चीन ने इस मुद्दे पर कोई पारदर्शी रवैया अख्तियार नहीं किया था।

इस कमेटी ने अपनी जांच में चीन और WHO इस पूरे नेक्सस का भंडा फोड़ कर दिया है, कि किस तरह से इन दोनों ने मिलकर पूरी दुनिया को कोरोनावायरस जैसी वैश्विक महामारी की कगार पर पहुंचाया। चीन की इस मुद्दे को लेकर भारत, बांग्लादेश, अमेरिका, जापान, इटली आस्ट्रेलिया जैसे देश आलोचना कर चुके है। WHO का रवैया कोरोना को वैश्विक महामारी घोषित करने से लेकर अभी तक चीन के प्रति सकारात्मक और पक्ष लेने वाला ही रहा है। इस स्वतंत्र कमेटी ने दोनों को लेकर अपनी जांच रिपोर्ट में जो कुछ भी कहा है असल में सब कुछ अन्य देश पहले ही बोल चुके हैं, और ये चीन और WHO के लिए एक खतरे की घंटी है।

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