राकेश टिकैत की संपत्ति 80 करोड़ है, बच्चे बाहर पढ़ते हैं- ये “करोड़पति” क्या किसानों की आवाज़ उठाएगा

 


26 जनवरी के बाद तथाकथित किसान आंदोलन जब कमजोर पड़ा तो जाट की जातीय अस्मिता का कार्ड खेलकर इस अराजकतावादी आंदोलन को पुनः मजबूती देने वाले भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत के सियासी सफर के बारे में तो खूब बाते हो रही हैं, लेकिन कथित संघर्ष से इतर उनकी असल किसानी और संपत्ति लोंगों को आश्चर्यजनक स्थिति में डाल सकती है क्योंकि उनकी कुल संपत्ति करीब 80 करोड़ से ज्यादा की है। देश के चार राज्यों में उन्होंने अपनी संपत्ति का साम्राज्य फैला रखा है और उनकी बेटी ऑस्ट्रेलिया से ही इस किसान आंदोलन को समर्थन दे रही है जो दर्शाता है कि वो केवल एक दिखावे के किसान हैं और अपने सियासी एजेंडे के लिए असल किसानों को आंदोलन की आग में झोंक रहे हैं।

राकेश टिकैत एक तरफ दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर हरियाणा तक में जाट अस्मिता का मुद्दा उठाकर किसान आंदोलन को मजबूत कर रहे हैं तो दूसरी ओर उनके अपने पेशे से बाहर होने के बावजूद उनकी संपत्ति में दिन-दूनी रात-चौगुनी तरक्की हो रही है। राकेश टिकैत की संपत्ति की बात करें तो देश के चार राज्यों में उनकी भारी भरकम संपत्ति है। टिकैत की महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली में 80 करोड़ की संपत्ति है जो कि मुजफ्फरनगर, ललितपुर, झांसी, लखीमपुर खीरी, बिजनौर, बदायूं, दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, देहरादून, रुड़की, हरिद्वार और मुंबई में फैली हुई है।

किसानों के हक का दावा कर आए दिन किसानों को आंदोलन को आग में झोंकने वाले टिकैत के कई बड़े कारोबार हैं, जिनमें शोरूम, पेट्रोल पंप, ईंट के भट्टे, जमीन आदि हैं जिसके चलते उनका बैंक बैलेंस में शून्य की तादाद बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है। केवल इतना ही नहीं राकेश टिकैत की बेटी इतनी ज्यादा पैसे वाली है कि वो ऑस्ट्रेलिया में ही शादी करके सेटल हो गई है। जब उनके पिता यहां देश में किसान आंदोलन के नाम पर अराजकतावादियों का नेतृत्व कर रहे हैं, तो बेटी सीमा टिकैत भी ऑस्ट्रेलिया में खालिस्तानी समर्थकों के साथ किसान आंदोलन को हवा देने के लिए भारतीय दूतावास के सामने नारेबाजी करती दिख चुकी हैं।

राकेश टिकैत ने अपनी संपत्ति के जरिए अपना पूरा जीवन सेट कर रखा है। उनका न खेती से सरोकार रहा है न ही कृषि में कोई दिलचस्पी। इसके बावजूद वो केन्द्र द्वारा पारित कृषि कानूनों के मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन केवल इसलिए कर रहे है, क्योंकि वो इसमें अपनी सियासत की संभावनाएं देख रहे हैं। शायद इसीलिए वो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ ही दिल्ली और हरियाणा में जाकर बार-बार जाट की जातीय अस्मिता का मुद्दा उठा रहे हैं।

तथाकथित किसान और असल में करोड़पति राकेश टिकैत की कृषि बिलों के विरोध के जरिए अन्य किसानों की छवि को धूमिल कर रहे हैं क्योंकि ये आंदोलन हिंसा की भेंट चढ़ चुका है। ये ऐसी स्थिति की ओर भी ले जा सकता है, जहां किसानों की वाजिब मांगे भी टिकैत जैसे महत्वकांक्षी लोंगो के कारण नजरंदाज हो जाएंगी, इसलिए अब वक्त है कि असली किसानों को टिकैत की रणनीति समझनी चाहिए।

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