विपक्ष न तब था न अब है!


इन दिनों जनता में नंबर एक चर्चा, नंबर एक सवाल है विपक्ष कहां है? पेट्रोल-डीजल के दाम रिकार्ड तोड़ ऊंचाई पर है, महंगाई बढ़ रही है और लोगों का रोना है कि विपक्ष नहीं है। मतलब यदि राहुल गांधी की जगह कोई और होता तो असंतोष, आंदोलन का ज्वार चौतरफा बना होता। सचमुच विरोधी पार्टियों, सिविल सोसायटी, मीडिया और पंच-सरपंच सभी यह रोना लिए हुए हैं कि ऐसा कोई नेता ही नहीं है, जो लोगों की बेहाली, गुस्से को नेतृत्व दे सके। उलटे नरेंद्र मोदी हर तरह से कमान में हैं। प्रत्यक्षतः यह बात सही होते हुए भी सतही है। जरा विचार करें भारत में कब पहले विरोधी नेता की जन कमान ने सत्ता परिवर्तन कराया। कभी नहीं। हमेशा जनता ने, लोगों के अनुभव और मौन खदबदाहट ने सत्ता परिवर्तन कराया। क्या मनमोहन सिंह ने दस साल खटके से राज नहीं किया था? अन्ना हजारे, रामदेव, अरविंद केजरीवाल ने लोकपाल, भ्रष्टाचार पर जन असंतोष को आवाज जरूर दी लेकिन नरेंद्र मोदी सियासी विकल्प तो हाशिए में थे। वे गुजरात में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे हुए दूर से तमाशा देख रहे थे। लोकपाल आंदोलन, भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल में उनका कोई योगदान नहीं था। भाजपा ने जब उन्हें प्रचार अभियान का प्रमुख बनाया तभी उनका मौका बना और अवसर का फायदा उठाया।

हां, याद करें डॉ. मनमोहन सिंह ने अपनी हर तरह से चलाई। अमेरिका के साथ अकल्पनीय एटमी करार की हिम्मत की। महंगाई और भ्रष्टाचार के शोर के बावजूद वे खटके से राज करते रहे। उनके आगे न लेफ्ट आंदोलन खड़ा कर पाया और न राहुल गांधी की मौजूदा स्थिति के मुकाबले लाख गुना अधिक लौह पुरूष समझे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी व उनकी टोली की सुषमा, जेटली, वैंकेया, अनंत कुमार आदि यह माहौल बना पाए थे कि मनमोहन सिंह हटाओ देश बचाओ।

सन् 2009 में मनमोहन सिंह-कांग्रेस के आगे आडवाणी-भाजपा-एनडीए की हार नेतृत्व की कसौटी पर चुनाव का होना नहीं था, बल्कि जनता का बिना खदबदाहट के होना था। सन् 2012 के बाद आंदोलनों से खदबदाहट बनी तो अपने आप सरकार विरोधी सुगबुगाहट बनी, वह फैली और परिस्थितियों ने नरेंद्र मोदी का वक्त बनवा दिया। तब और अब की स्थिति में फर्क यह है कि नरेंद्र मोदी और उनके मीडिया तंत्र ने पहले दिन से मिशन बनाया हुआ है कि राहुल गांधी पप्पू हैं और ऐसी धारणा बनी रहे। भाजपा और हिंदुवादी वोट पुख्ता बने रहें। लोग राहुल गांधी के हवाले सोचे ही नहीं कि विकल्प है या विकल्प हो सकता है। जाहिर है नरेंद्र मोदी ने गुजरात अनुभव, गुजरात मॉडल से हर तरह का यह प्रबंध बनाया हुआ है कि लोगों के जहन में या पार्टी-संघ में कोई विकल्प उभरे नहीं! वे लगातार फेल हों तब भी लोग यही सोचें कि विकल्प नहीं है।

पर भारत की 138 करोड़ लोगों की भीड़ गुजरात नहीं है। कई लोग मानते हैं कि ईवीएम से भीड़ नियंत्रित है। मैं इस बात को न मानता था और न मानता हूं। निर्णायक मसला लोगों के दिमाग की प्रोग्रामिंग है। गौर करें पिछले जून से अब तक बदले पंजाब पर। पंजाब में क्या ईवीएम मशीन से वापिस 2021 में मोदी का जादू निकल सकता है? कृषि कानूनों के बाद पंजाब में लोगों का मनोभाव जैसे बदला है वह क्या बिना नेतृत्व के हवा का बदलना नहीं है। फालतू बात है कि खालिस्तानियों ने लोगों का भड़काया। हकीकत में लोगों ने अपने आप खतरा बूझा, उनमें स्वंयस्फूर्त धारणाएं बनीं। खुद नरेंद्र मोदी, भाजपा-संघ में किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि सरकार के एक फैसले का इतना उलटा असर होगा। पंजाब इतना बदलेगा।

मूल वजह क्या? वही जो मनमोहन सिंह के आखिरी सालों या राजीव गांधी, या अटल बिहारी वाजपेयी या इंदिरा गांधी के पतन के आखिरी दो-तीन सालों में थी? सत्ता का अहंकार! सरकार ही सही बाकी सब गलत। भक्तों की फौज (याकि भाजपा के पक्के 20-22 करोड़ वोट) में आस्था, प्रचार से भले पेट्रोल-डीजल और महंगाई को देश देश जरूरत में त्याग माना जाए लेकिन नौजवान बेरोजगारों की हकीकत में यदि यूथ प्रमोटर साइकिल में सौ-दो सौ, तीन सौ रुपए का पेट्रोल प्रतिदिन भराता रहा और इस सबकी महंगाई में अगले दो-तीन साल लगातार महंगाई में वह जीया तो 90 करोड़ मतदाताओं में दुखी लोगों की क्या तादाद बनेगी इसका अनुमान लगाया जा सकता है। वह न तो विकल्प सोचते हुए होगी और न पुलवामा, सर्जिकल स्ट्राइक के फार्मूलों में फिर पहले जैसा भभका बनेगा। ध्यान रखें इंदिरा गांधी के बांग्लादेश बनवाने और वाजपेयी की कारगिल डुगडुगी के बावजूद लोग भ्रम में अधिक नहीं रहे।

कह सकते हैं नरेंद्र मोदी अजेय हैं। हिंदू जाग गया है। मीडिया पूरी तरह नियंत्रित है। सो, राहुल गांधी और विपक्ष खड़ा नहीं हो पाएगा। या यह ख्याल कि वे इमरजेंसी लगा देंगे। सत्ता छोड़ेंगे ही नहीं। ईवीएम मशीन का खेल होगा। ये सब फालतू बातें हैं। नरेंद्र मोदी को अब दुनिया की अधिक चिंता करनी होगी। मोदी की, हिंदू की और हिंदुवादी राजनीति की अब वैश्विक तौर पर इतनी अधिक बदनामी हो गई है और मोदी सरकार गलतियों, अहंकारों के ऐसे चक्रव्यूह में अपने को उलझा चुकी है, देश में विभाजकता के इतने बीज फूट चुके हैं कि अंधा-काना-लूला विपक्ष भी वैसे ही उठ खड़ा होगा जैसे वाजपेयी के शाइनिंग इंडिया हल्ले में सोनिया गांधी का नेतृत्व उभरा था। राजीव गांधी के आगे वीपी सिंह भी खिचड़ी विकल्प थे तो इंदिरा गांधी के आगे जनता पार्टी का विकल्प भी भानुमति का कुनबा था जबकि राहुल गांधी आज हम दो, हमारे दो का नारा लगाने की हिम्मत तो लिए हुए हैं। राहुल गांधी जैसे बोल रहे हैं और प्रधानमंत्री मोदी जवाब में अपने मंत्रियों को उनके खिलाफ जैसे उतारते हैं उसमें आगे कौन पप्पू साबित होगा और कौन छप्पन इंची छाती वाला?

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