पेट्रोल कीमतों पर बेसिर-पैर की बातें!


पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती कीमतों को लेकर केंद्र सरकार की ओर से जो कुछ भी कहा जा रहा है वह तथ्यात्मक रूप से गलत है या कम से कम अधूरा है। कुछ बातें तो बेसिरपैर की भी हैं। हां, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की एक बात ईमानदारी वाली लगी कि ‘मैं कुछ भी कहूंगी तो लगेगा कि मैं दूसरों पर दोष लगा रही हूं, बात को घुमा रही हों या सवाल के जवाब टाल रही हूं’। उन्होंने यह भी कहा कि ‘बढ़ती कीमतों का एक ही जवाब है, जिससे भारतीयों को संतुष्ट किया जा सकता है और वह जवाब है कि कीमतें घटाई जाएं’। यहां तक वे ईमानदार रहीं। पर पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत क्यों बढ़ रही है और वे क्यों नहीं घटा रही हैं इसका उनका जवाब तथ्यात्मक रूप से भी गलत था और अजीबोगरीब भी था।

वित्त मंत्री ने कहा कि तेल उत्पादक देशों ने तेल का उत्पादन कम कर दिया है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ रहे हैं। यह सही है कि कच्चे तेल के दाम बढ़ रहे हैं पर कच्चे तेल का दाम बढ़ना तुलनात्मक चीज है। कच्चे तेल के दाम की मौजूदा तेजी हाल में शुरू हुई है और यह 52 डॉलर प्रति बैरल से बढ़ना शुरू होकर 64 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंची है। मई 2014 में जब मनमोहन सिंह का कार्यकाल खत्म हुआ तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 107 डॉलर प्रति बैरल थी और तब देश में पेट्रोल की कीमत 71 रुपए और डीजल की कीमत 56 रुपए थी। आज कच्चा तेल 64 डॉलर प्रति बैरल है और पेट्रोल की कीमत पूरे देश में 90 रुपए से ऊपर है। पिछले साल मई में यानी कोरोना के पीक पर एक समय ऐसा भी आया था तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का दाम प्रति बैरल 30.61 डॉलर का था लेकिन तब भी देश में पेट्रोल की कीमत 70 रुपए लीटर थी। उस समय भी सरकार ने कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का फायदा आम लोगों को नहीं दिया था। उलटे उत्पाद शुल्क में बेतहाशा बढ़ोतरी करके अपना खजाना भरना चालू रखा था। इसलिए कच्चे तेल के उत्पादन में कटौती का तर्क सही नहीं है।

वित्त मंत्री ने दूसरी बात बहुत अजीबोगरीब कही। उन्होंने कहा कि ‘मैं शुल्क घटा सकती हूं अगर मुझे इस बात की गारंटी मिले कि मेरा जो राजस्व कम होगा, उस स्पेस में दूसरा आकर इसे अवसर बना कर फायदा न उठाने लगे’। उनकी इस बात में मैं का मतलब केंद्र सरकार है और दूसरा का मतलब राज्य सरकारें हैं। असल में पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों का बचाव करने के लिए यह प्रचार भी किया जा रहा है कि राज्यों का वैट या बिक्री कर भी बहुत है। इसी की ओर इशारा करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि दूसरा यानी राज्य अपने कर बढ़ा कर कमाई न करने लगें। हकीकत यह है कि राज्य अपना शुल्क तभी बढ़ाते हैं, जब केंद्र का उत्पाद शुल्क बढ़ता है। जब केंद्र सरकार उत्पाद शुल्क घटाती है तो राज्यों पर भी दबाव होता है कि वे वैट या बिक्री कर घटाएं। असली बात यह है कि केंद्र सरकार अपनी जिम्मेदारी समझे और पिछले छह साल में उसने जो 13 बार उत्पाद शुल्क बढ़ाया है उसे कम करे।

असल में यह ध्यान हटाने की तिकड़म से ज्यादा कुछ नहीं है। तेल का असली गणित यह है कि कच्चा तेल अब भी 32.10 रुपए प्रति लीटर के हिसाब से मिल रहा है। इसके ऊपर केंद्र सरकार प्रति लीटर 32.98 रुपया उत्पाद शुल्क ले रही है। इसके ऊपर हर राज्य का अपना वैट या बिक्री कर जुड़ता है, जो कि अलग अलग होता है। अगर दिल्ली की बात करें तो दिल्ली सरकार एक लीटर पेट्रोल पर 20 रुपया वैट लेती है। यानी एक लीटर पेट्रोल के ऊपर 53 रुपया टैक्स लगता है। दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल की कीमत में 60 फीसदी टैक्स है। मई 2014 में जब मनमोहन सिंह की विदाई हुई तब कच्चे तेल की कीमत 47.13 रुपए थी और बाजार में पेट्रोल 71 रुपए प्रति लीटर मिलता था। इस समय कच्चे तेल की कीमत प्रति लीटर 15 रुपए कम हो गई है और बाजार में दाम 19 रुपया बढ़ गया है। यानी 34 रुपए प्रति लीटर का फर्क आ गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनमोहन सिंह की सरकार पेट्रोल पर 10 रुपए और डीजल पर साढ़े तीन रुपया उत्पाद शुल्क लेती थी और मौजूदा सरकार पेट्रोल पर 32.98 रुपए और डीजल पर 31.63 रुपए टैक्स लेती है।

इस तथ्य की रोशनी में देखें तो सरकार की इन बातों का कोई मतलब नहीं है कि कच्चे तेल का उत्पादन कम हो रहा है या कच्चा तेल महंगा हो रहा है, इस वजह से कीमतें बढ़ रही हैं। वित्त मंत्री से पहले प्रधानमंत्री ने भी एक अजीबोगरीब बात कही थी। उन्होंने कहा था कि पिछली सरकारों ने आयातित तेल पर निर्भरता कम नहीं की इसलिए महंगाई बढ़ रही है। यह अर्धसत्य है क्योंकि महंगाई कच्चे तेल की वजह से नहीं, बल्कि सरकार की ओर से अंधाधुंध बढ़ाए गए टैक्स की वजह से बढ़ी है। एक लीटर कच्चे तेल की कीमत से ज्यादा टैक्स अकेले भारत सरकार वसूल रही है। 32 रुपए लीटर के कच्चे तेल पर 33 रुपए का टैक्स भारत सरकार ले रही है। फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि आयातित तेल पर निर्भरता के कारण महंगाई बढ़ी है?

दूसरा सवाल यह है कि पिछले सात साल में नरेंद्र मोदी की सरकार ने आयातित तेल पर निर्भरता कम करने के लिए क्या किया है? उपलब्ध आंकडों के मुताबिक 2008-09 में भारत 132.78 मीट्रिक टन कच्चा तेल आयात करता था, जो 2017-18 में बढ़ कर 220.43 मीट्रिक टन हो गया। भारत पहले भी अपनी जरूरत का 80 फीसदी तेल आयात करता था और आज भी 82 फीसदी तेल आयात करता है। यह सही है कि भारत की ऊर्जा जरूरतें बढ़ी हैं पर उसे पूरा करने के लिए दूसरे माध्यम भी आए हैं। इसके बावजूद आयातित तेल पर से निर्भरता कम नहीं हुई है। तीसरा सवाल यह है कि जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर 2014 में चुनाव लड़ने उतरे तो क्या उनको पता नहीं था कि भारत आयातित तेल पर निर्भर है? तब उन्होंने क्यों पेट्रोलियम उत्पाद सस्ता करने का वादा किया था? क्यों वे और उनके प्रचारक कहते थे कि पेट्रोल 30-40 रुपए लीटर मिलना चाहिए? क्यों चारों तरफ होर्डिंग्स लगाए गए थे कि ‘बहुत हुई पेट्रोल-डीजल की मार अबकी बार मोदी सरकार’? इसका मतलब है कि उस समय लोगों को बरगलाने के लिए झूठ बोला गया था! आज प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि पिछली सरकारों ने आयातित तेल पर निर्भरता कम नहीं की इसलिए महंगाई बढ़ रही है लेकिन 2015 में जब कच्चा तेल सस्ता हुआ तो क्यों उन्होंने खुद को नसीब वाला प्रधानमंत्री बताया था? क्या अब उनका नसीब काम नहीं कर रहा है?

भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में ऊर्जा जरूरतों के लिए तेल पर से निर्भरता कम की जा रही है। लेकिन ऐसा महंगाई के कारण नहीं हो रहा है, बल्कि पर्यावरण की सुरक्षा के लिहाज से हो रहा है। दुनिया के देश महंगाई की वजह से वैकल्पिक ऊर्जा की ओर नहीं जा रहे हैं क्योंकि दुनिया के दूसरे देशों में पेट्रोलियम उत्पादों की इतनी महंगाई नहीं है। भारत के पड़ोसी देशों में पाकिस्तान 51 रुपए लीटर पेट्रोल बेच रहा है तो श्रीलंका 60 रुपए, नेपाल 68 रुपए और बांग्लादेश 76 रुपए लीटर पेट्रोल बेच रहा है। अमेरिका और चीन दोनों देशों में पेट्रोल की कीमतों में पांच फीसदी तक की कमी आई है। महंगाई सिर्फ भारत में है और वह इसलिए है क्योंकि भारत में अनाप-शनाप टैक्स लिया जा रहा है।

अगर सरकार को आयातित तेल पर निर्भरता कम करनी है तो ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत को बढ़ावा देने के साथ साथ सरकार को पेट्रोलियम उत्पादों में इथेनॉल मिलाने की नीति पर आगे बढ़ना चाहिए और इथेनॉल की पॉलिसी को नियंत्रण मुक्त करना चाहिए। इससे किसानों का भी भला होगा और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत भी घटेगी। लेकिन अफसोस की बात है कि तमाम बातों के बावजूद अभी तक आठ फीसदी से ज्यादा इथेनॉल की मात्रा नहीं बढ़ाई जा सकी है, जबकि यह तथ्य है कि दूसरे विश्व युद्ध के समय अमेरिका ने अपने यहां पेट्रोलियम उत्पादों में 60 फीसदी तक इथेनॉल का इस्तेमाल किया था।

प्रधानमंत्री बार बार किसानों की आय दोगुनी करने की बात करते हैं और दूसरी ओर डीजल की कीमत में बेतहाशा बढ़ोतरी करते हैं। दोनों चीजें एक साथ नहीं हो सकती हैं। किसान का सबसे बड़ा खर्च जुताई पर होता है, जिसके लिए उसे डीजल की जरूरत होती है। सरकार उसकी उपज के दाम में जो बढ़ोतरी कर रही है उससे ज्यादा उसे डीजल की कीमत पर चुकानी पड़ रही है। फिर ऐसे कैसे आमदनी दोगुनी होगी!

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