कम GST देना और क़ानूनों की धज्जियां उड़ाना- कुछ इस तरह पंजाब खेती के लिए सबसे बुरा Example है

  


पिछले काफी समय से हिंसक किसान प्रदर्शन के कारण पूरे देश में अराजकता का माहौल है। इस पूरे प्रदर्शन के केंद्र में पंजाब के किसान हैं, जो करीब तीन महीनों से सिंघू बॉर्डर पर चक्का-जाम लगाए बैठे हैं। कुछ जगहों पर इस प्रदर्शन को हरियाणा के किसानों से भी समर्थन मिल रहा है, लेकिन मुख्यतः इसे पंजाबी किसानों द्वारा ही आगे बढ़ाया गया है। पंजाब के किसान हरियाणा-दिल्ली बॉर्डर पर बैठकर और लाल किले पर कब्जा जमाकर देश का नाम पूरे विश्व में बदनाम कर रहे हैं। इन किसानों की वजह से अब तक देश को करीब 70 हज़ार करोड़ से ज़्यादा का नुकसान हो चुका है। लेकिन आज यह भी देख लेते हैं कि देश को इतना बड़ा नुकसान पहुंचा रहे पंजाब के किसानों का देश के विकास में योगदान क्या है? केंद्र सरकार द्वारा शुरू से ही बड़े लाड़-प्यार से पाले गए इन किसानों की आदत अब इतनी बिगड़ चुकी है कि इनके लिए सरकार के खिलाफ उग्र प्रदर्शन करना एक मनोरंजन का साधन बन गया है। आज इन उग्र किसानों को उनकी जगह दिखाने का दिन है।

देश में ड्रग कारोबार का केंद्र बन चुके पंजाब की अर्थव्यवस्था हरियाणा की तरह ही कृषि पर ही आधारित है। हालांकि, यहाँ के किसान, किसान कम और ज़मीन के मालिक ज़्यादा है। आसान भाषा में कहें तो पंजाब के किसानों का खेती से जुड़ाव लगातार कम होता जा रहा है, क्योंकि इस राज्य में खेती से जुड़ा अधिकतर काम बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से आने वाले मजदूरों द्वारा किया जाता है। Indiaspend की एक रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब के क्षेत्रीय मजदूर तो खेतों में सिर्फ 20 प्रतिशत काम ही करते हैं, बाकी का 80 प्रतिशत काम बाहर से आए मजदूरों द्वारा ही किया जाता है। पिछले साल कोरोना के कारण जब बिहार और UP के अधिकतर मजदूर वापस अपने घर को लौट गए थे, तो पंजाब के किसानों के हाथ-पैर फूल गए थे। ऐसे में खेतों के मालिकों को हमें “किसान” कहकर समाज को भ्रमित नहीं करना चाहिए। इन लोगों के मुद्दे देश के बाकी राज्यों के असली किसानों के मुद्दों से एकदम अलग है, और इसीलिए इसी राज्य में मोदी-विरोधी प्रदर्शन सबसे ज़्यादा उग्र है।

खैर पंजाब के किसानों द्वारा देश को पहुंचाया गया 70 हज़ार करोड़ का नुकसान एक तरफ, इसी पंजाब के लोग देश की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान देने में सबसे पीछे हैं। पंजाब और हरियाणा कहने को एक समान राज्य हैं। दोनों राज्यों की आबादी भी लगभग एक समान है और दोनों राज्यों की अर्थव्यवस्था कृषि पर ही आधारित है। हालांकि, जब बाद tax देने की आती है तो पंजाब के लोग इतने ज़्यादा उत्साहित नहीं दिखाई देते। अक्टूबर 2020 में हरियाणा से जहां 5433 करोड़ का GST प्राप्त हुआ था, तो वहीं पंजाब के लोगों ने सिर्फ 1376 करोड़ के GST का भुगतान किया। पंजाब को देश के अमीर राज्यों में गिना जाता है, लेकिन गरीब राज्य बिहार ने भी इस दौरान करीब 1100 करोड़ का GST दिया, पंजाब से थोड़ा ही कम! यानि पंजाब अमीर होकर भी बिहार जितना tax देश को दे रहा है, जो इस राज्य के लिए शर्म की बात है। लेकिन यहाँ के लोगों के नखरे हद से ज़्यादा है।

यहाँ के किसानों को देश का सबसे गैर-जिम्मेदार किसान कहा जाये, तो भी किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। गैर-जिम्मेदार इसीलिए क्योंकि हर साल पराली जलाने में यहाँ के किसान सभी राज्यों के किसानों को पीछे छोड़ते हैं। Times of India की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र सरकार ने पंजाब को हद से ज़्यादा पैसे देकर अपने यहाँ पराली जलाने की घटनाओं को कम करने को कहा, तो पंजाब के किसानों ने पिछले तीन सालों में इन घटनाओं में 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज कर डाली। केंद्र सरकार द्वारा पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए आवंटित किए गए कुल बजट का करीब आधा हिस्सा अकेले पंजाब को दिया गया। इस दौरान हरियाणा और UP के किसानों ने जहां पराली जलाने से परहेज किया तो पंजाब के किसानों ने कहा “सान्नू की?”

पंजाब के किसानों को आजादी के बाद से सरकार की MSP स्कीम का सबसे ज़्यादा फायदा हुआ है। केंद्र सरकार इनपुट फ्रंट (बीज सब्सिडी, उर्वरक सब्सिडी, रियायती ऋण, बिजली सब्सिडी) के साथ-साथ आउटपुट फ्रंट (एमएसपी, कृषि विपणन में निवेश) पर कृषि सब्सिडी देती है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें से अधिकांश सब्सिडी पंजाब में जाती है। सब्सिडी खाने के मामले में पंजाब सबसे आगे बेशक हो, लेकिन अपनी जिम्मेदारियों का वहन करने और देश के विकास में योगदान देने में इसी पंजाब के लोग सबसे पीछे रह जाते हैं।

शायद यही कारण है कि अब अपनी ऐशो-आराम दिनचर्या को खतरे में पाकर पंजाब के किसानों ने दिल्ली में दंगा करने को मनोरंजन का साधन बना लिया है। इसके ऊपर से यहाँ खालिस्तानी तत्वों ने भी डेरा जमा लिया है, जिसके कारण पूरे देश में पंजाब की थू-थू पहले ही हो रही है।

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