देश नहीं तो और क्या बिक रहा?


देश क्या है? क्लासिक परिभाषा के मुताबिक एक विशिष्ट भू-भाग या राजनीतिक ईकाई को देश कहते हैं, जहां अनेक धर्म, नस्ल, जाति के लोग एक साथ रहते हैं और जहां एक संप्रभु सरकार होती है। जाहिर है देश कोई अमूर्त सी चीज नहीं है और न देशभक्ति कोई अमूर्त चीज है। ढेर सारी चीजों से देश बनता है और उन तमाम चीजों से प्रेम करना देशभक्ति है। राष्ट्रपति का तख्त या प्रधानमंत्री की कुर्सी, संसद भवन या संविधान, राष्ट्रगान या राष्ट्रीय झंडा ही देश नहीं होता है। उसके नागरिक, उसकी संस्थाएं, उसके प्राकृतिक संसाधन सब मिल कर देश बनाते हैं। नागरिक देश की आत्मा होते हैं और बाकी सारी चीजें देश नाम की एक जैविक संरचना का हिस्सा होती हैं।

तभी सवाल है कि क्या देश की संपत्ति बेचने को देश बेचना कह सकते हैं? इसका कोई वस्तुनिष्ठ जवाब नहीं हो सकता है। हां या ना में इसका जवाब नहीं दिया जा सकता है। यह सब्जेक्टिव मामला है। इसका जवाब इस पर निर्भर करता है कि आप इस समय पाले के किस तरफ खड़े हैं। सरकार में शामिल या उसके साथ खड़े लोग नहीं मानते हैं कि देश बिक रहा है। उनको इसमें कोई दिक्कत नहीं है कि सभी सरकारी संपत्तियों को बेच दिया जाए। यह अलग बात है, जब ये ही लोग पाले के दूसरी तरफ खड़े थे तो विनिवेश का हर प्रस्ताव उन्हें देश बेचने वाला लगता था। संभवतः तभी नरेंद्र मोदी ने कहा था कि ‘देश नहीं बिकने दूंगा, देश नहीं झुकने दूंगा, देश नहीं मिटने दूंगा’।

हकीकत यह है कि देश में नागरिक खरीदे-बेचे जा रहे हैं। हाल ही में एक रिपोर्ट आई थी कि मध्य प्रदेश की लड़कियों को राजस्थान में बेचा गया। बोली लगा कर लोगों ने खरीद-फरोख्त की। देश के कई आदिवासी बहुल इलाकों में ऐसी खरीद फरोख्त होती है। यह देश की आत्मा पर लगने वाला घाव है। लेकिन वह किसी का सरोकार नहीं है क्योंकि खरीदे-बेचे जाने वाले लोगों की कोई हैसियत नहीं है। इसी तरह सरकारी संपत्तियों की चौतरफा बिक्री हो रही है। सरकार खरीद कुछ नहीं रही है, बल्कि दशकों के सरकारी निवेश और लाखों-करोड़ों नागरिकों के श्रम से जो संपत्ति बनी है उसको बेच रही है। क्या इन संपत्तियों की बिक्री को देश बिकना नहीं कह सकते हैं? अगर कोई संप्रभु सरकार अपनी सारी संपत्ति बेच देती है तो उसे देश बिकना नहीं तो और क्या कहेंगे? अगर इसे नहीं तो फिर किस चीज के बिकने को देश बिकना कहेंगे?

ऐसा नहीं है कि बेचने की यह प्रक्रिया अभी शुरू हुई है। पहले इसे विनिवेश के नाम पर शुरू किया गया। तब कहा गया था कि सार्वजनिक उपक्रमों में सरकार अपनी कुछ हिस्सेदारी बेचेगी। यह भी कहा गया कि सरकार उन्हीं कंपनियों को बेचेगी, जो घाटे में चल रही हैं या बंद हो गई हैं। जो कंपनियां मुनाफा कमा रही हैं उनमें कुछ हिस्सेदारी बेची जाएगी पर मालिकाना हक सरकार का ही होगा। विनिवेश के इस सिद्धांत पर भारत में बहुत कुछ बेचा गया। लेकिन अब इसकी बजाय यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है कि सरकार का काम बिजनेस करना नहीं है इसलिए सरकार हर बिजनेस से बाहर हो जाएगी। लेकिन अगर ध्यान से देखें तो सरकार जिसे बिजनेस बता कर बेच रही है और उससे बाहर हो रही है उसमें से ज्यादातर काम बिजनेस के लिए शुरू नहीं किए गए थेबल्कि इस देश के करोड़ों करोड़ लोगों की सेवा के लिए शुरू किए गए थे।

सरकार बैंक बेचने जा रही है। सवाल है कि क्या बैंक चलाना सिर्फ एक बिजनेस है? फिर तो जिस निजी कंपनी के हाथ में बैंक चले जाएंगे वह बिजनेस करेगा और तब आम लोगों का क्या होगा? क्या निजी बैंकिंग कंपनियां देश के दूर-दराज के इलाकों में अपनी शाखाएं खोलेंगी? सरकारी बैंकों की शाखाएं आज देश के हर हिस्से में हैं। पहाड़, जंगल और दूर-दराज के गांवों में जहां बैंकिंग सेवा का इस्तेमाल करने वालों की संख्या गिनी-चुनी है वहां भी सरकारी बैंकों की शाखाएं हैं। जो भी निजी कंपनी सरकारी बैंकों को खरीदेगी वो सबसे पहले दूर-दराज की ऐसी शाखाओं को बंद करेगी, जहां ज्यादा बिजनेस नहीं होगा। इससे लोगों की छंटनी होगी और बड़ी संख्या में लोग बैंकिंग सेवाओं से वंचित होंगे।

यहीं स्थिति संचार, विमानन और रेलवे के मामले में भी होगी। भारत की संचार कंपनी कोई बिजनेस करने के लिए नहीं बनी थी, बल्कि दूर-दराज के लोगों तक संचार की सुविधा पहुंचाना उसका पहला काम था। जबकि निजी संचार कंपनियों ने लाइसेंस की शर्तों के बावजूद दूर-दराज के इलाकों में, ग्रामीण क्षेत्रों में, पहाड़ और जंगल में अपनी सेवा नहीं शुरू की या शुरू की है तो सर्विस बहुत खराब है। निजी विमानन कंपनियां उन रूट्स पर विमान नहीं उड़ाती हैं, जहां मुनाफा नहीं है, जबकि सरकारी विमानन सेवा पूरे देश को जोड़ने के लिए चलाई गई थी।

भारतीय रेल हर दिन ढाई करोड़ लोगों को उनके गंतव्य तक पहुंचाती है। यह कोई कारोबार नहीं है, बल्कि सेवा है। क्या यहीं सेवा निजी कंपनियां देंगी? जहां भी निजी कंपनियों को ट्रेन चलाने के लिया दिया गया या स्टेशनों के रख-रखाव की जिम्मेदारी दी गई वहां किराया और दूसरी कीमतों को देखने के बाद नहीं लगता है कि उनका मकसद लोगों को सेवा देना है। उन्हें दशकों के निवेश और लोगों की मेहनत से बने बुनियादी ढांचे का सिर्फ कारोबारी इस्तेमाल करना है।  जिस देश में 80 करोड़ लोग सरकार से मुफ्त में मिलने वाले पांच किलो अनाज पर पल रहे हैं वहां उन्हें संचार, परिवहन और बैंकिंग जैसी बुनियादी सेवाओं के लिए निजी सेक्टर के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता है। क्या सरकार इस बात को नहीं समझ रही है कि लोक कल्याणकारी राज्य अपने संसाधनों या अपने उपक्रमों के जरिए लोगों की सेवा करती है, जबकि उन्हीं उपक्रमों को अगर निजी हाथों में दे दिया जाए तो वे उसका मुनाफा कमाने के लिए इस्तेमाल करेंगे?

केंद्र की मौजूदा सरकार में शामिल लगभग हर नेता ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को धरती, आकाश और पाताल में सारी चीजें बेच देने और इन सबकी बिक्री में भारी भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाया था। आज वहीं काम तो यह सरकार भी कर रही है। सरकार प्राथमिकता के साथ यह काम करती दिख रही है कि क्या क्या बेचा जा सकता है। नीति आयोग का मुख्य काम उन संपत्तियों की सूची बनाना है, जिन्हें बेचा जा सकता है। सरकार रेलवे को बेचने जा रही है। 50 स्टेशन और डेढ़ सौ ट्रेनें बेच कर 90 हजार करोड़ रुपए जुटाने का लक्ष्य है। बीएसएनएल, एमटीएनएल और भारत नेट की संपत्ति बेच कर 40 हजार करोड़ रुपए जुटाने हैं। सरकार सात हजार किलोमीटर की बनी हुई सड़क बेचने जा रही है, जिससे उसे 30 हजार करोड़ रुपए मिलेंगे। ऊर्जा सेक्टर में ट्रांसमिशन नेटवर्क और ग्रिड बेच कर 20 हजार करोड़ रुपए जुटाना है तो विमानन सेक्टर में सरकार 13 हवाईअड्डे बेचने जा रही है और दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरू व हैदराबाद हवाईअड्डे में अपनी बची हुई हिस्सेदारी भी बेच कर 20 हजार करोड़ रुपए की कमाई करने वाली है। इंडियन ऑयल, एचपीसीएल, गेल आदि की पाइपलाइन बेच कर सरकार 17 हजार करोड़ रुपए कमाएगी।

सोचें, सड़कें बिक जाएंगी, रेलवे लाइन, स्टेशन और प्लेटफॉर्म बिक जाएंगे, हवाईअड्डे और सारे हवाईजहाज बिक जाएंगे, संचार की सुविधाएं बिक जाएंगी, तेल और गैस की पाइप लाइन बिक जाएगी, बिजली ट्रांसमिशन की लाइनें और तमाम ग्रिड बिक जाएंगे, सारे बैंक और बीमा क्षेत्र की कंपनियां बिक जाएंगी, रक्षा क्षेत्र की कंपनियां बिक जाएंगी, सारे बंदरगाह बिक जाएंगे, हवा में सारी तरंगें और जमीन के नीचे का कोयला-लोहा सब बेच दिया जाएगा और इस तरह देश के 138 करोड़ नागरिकों का जीवन निजी कंपनियों के हवाले कर दिया जाएगा तो क्या इसे देश बिकना नहीं कहेंगे? देश इन्हीं सब चीजों से तो बना है इसलिए इन सबका बिकना, देश बिकना ही है।

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