सिर्फ वैक्सीन से नहीं बनेगी बात


भारत में ‘दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीनेशन अभियान’ 16 जनवरी को शुरू हुआ था और मार्च के पहले दिन तक यानी 44 दिन में कुल एक करोड़ 43 लाख लोगों को टीका लगाया गया था। इसका मतलब है कि हर दिन औसतन तीन लाख से कुछ ज्यादा लोगों को टीका लगाया गया। टीकाकरण के पहले चरण में एक करोड़ स्वास्थ्यकर्मियों और दो करोड़ फ्रंटलाइन वर्कर्स को टीका लगाया जाना है। इनमें से ज्यादातर सरकारी कर्मचारी हैं, जिनके लिए किसी न किसी तरह से टीकाकरण अनिवार्य किया जा रहा है। ऊपर से टीका मुफ्त में भी लग रहा है फिर भी 43 दिन में आधे से कम लोगों ने टीका लगवाया। इसका मतलब है कि वैक्सीन पर या तो लोगों का भरोसा नहीं बन रहा है या इसमें उनकी रूचि नहीं है।

इस लिहाज से अच्छा हुआ जो वैक्सीनेशन के दूसरे चरण का पहला टीका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद लगवाया। उनके टीका लगवाने से लोगों में भरोसा पैदा हुआ है और उत्साह भी जगा है। तभी पहले दिन 25 लाख लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया और चार लाख से ज्यादा लोगों को टीका लगाया गया। कुछ शर्तों के साथ वैक्सीन अब खुले बाजार में उपलब्ध करा दी गई है। दूसरे चरण के वैक्सीनशन की शर्तों के दायरे में आने वाले लोग निजी अस्पतालों में जाकर ढाई सौ रुपए में एक डोज लगवा सकते हैं। अब सवाल है कि जब लोग ढाई सौ रुपए देकर टीका लगवाएंगे तो मुफ्त टीकाकरण की घोषणाओं का क्या हुआ? आम लोगों के लिए वैक्सीनेशन शुरू होने के बाद बिहार इकलौता राज्य है, जिसने कहा कि निजी अस्पतालों में भी टीका मुफ्त लगेगा। बिहार के अलावा कई और राज्यों ने मुफ्त टीका लगवाने का ऐलान किया था, उनका क्या हुआ? इस साल केंद्रीय बजट में वैक्सीन के लिए 35 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, अगर लोग ढाई सौ रुपए देकर वैक्सीन लगवाएंगे तो बजट में घोषित पैसे का क्या होगा?

हैरानी की बात है कि लोग ये सवाल नहीं पूछ रहे हैं, बल्कि इस बात से खुश हैं कि वैक्सीन सस्ती है और निजी अस्पतालों में बिना ज्यादा भीड़-भाड़ के वे वैक्सीन लगवा पाएंगे। ध्यान रहे ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन का उत्पादन कर रही भारतीय कंपनी सीरम इंस्टीच्यूट ऑफ इंडिया के सीईओ अदार पूनावाला ने कहा था कि आम लोगों को खुले बाजार में वैक्सीन की एक डोज एक हजार रुपए में मिलेगी। लेकिन वह डोज अब ढाई सौ रुपए में मिल रही है। क्या सरकार अपने पैसे से खरीद कर निजी अस्पतालों को वैक्सीन की डोज दे रही है? फिर अस्पताल जो पैसा ले रहे हैं उसमें से अपना सर्विस चार्ज काट कर क्या बाकी पैसा वे सरकारी खजाने में जमा कराएंगे? या वह उनकी कमाई है? कमाई चाहे सरकार की हो या निजी अस्पताल की असली मसला यह है कि लोगों की जेब से पैसा निकल रहा है!

इतना होने के बावजूद भी क्या इस बात की गारंटी है कि देश में ज्यादातर लोग टीका लगवाएंगे और उससे कोरोना वायरस का कहर थम जाएगा? कम से कम अभी इसकी उम्मीद नहीं दिख  रही है। देश में वायरस की नई लहर आई हुई है। पिछले कई दिन से देश के 22-23 राज्यों में एक्टिव केसेज में बढ़ोतरी हुई है यानी ठीक होने वाले मरीजों के मुकाबले नए मरीज ज्यादा मिले हैं। भले इनकी संख्या कम है पर यह चिंताजनक लक्षण है। दूसरी चिंता इस बात को लेकर भी है कि दुनिया के कई देशों में मिले स्ट्रेन का संक्रमण भी देश में फैल रहा है। ब्रिटेन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका में मिले स्ट्रेन के केसेज भारत के 20 राज्यों में फैल गए हैं।

वैक्सीनेशन के बीच कोरोना के केसेज बढ़ने का क्या कारण हो सकता है? हर राज्य के अपने कुछ न कुछ स्थानीय कारण हैं। जैसे महाराष्ट्र में हर नागरिक के लिए लोकल ट्रेन सेवा शुरू होने के बाद केसेज बढ़े हैं। इसी तरह के कारण हर राज्य में होंगे। लेकिन एक केंद्रीय कारण यह है कि सरकार ने टेस्टिंग घटा दी है। दिसंबर के आखिर तक देश में हर दिन 11 लाख टेस्ट हो रहे थे, जो घट कर आधे हो गए हैं। अब पांच से छह लाख टेस्टिंग रोज हो रही है। अगर पहले जितनी टेस्टिंग हो रही होती तो अभी केसेज की संख्या भी दोगुनी होती। यानी अगर अभी औसतन 16 हजार केस हर दिन आ रहे हैं तो टेस्टिंग दोगुना करने पर 32 हजार केस आएंगे।

असल में टेस्ट ही कोरोना है। टेस्ट नहीं होगा या कम होगा तो केसेज कम हो जाएंगे, बढ़ेगा तो केसेज बढ़ जाएंगे।

मिसाल के तौर पर पिछले दिनों राजस्थान के कोटा रेलवे स्टेशन पर 274 लोगों का रैंडम सैंपल लिया गया और उसमें से 50 लोग संक्रमित मिले। इसी तरह महाराष्ट्र के वाशिम में एक ब्वॉयज हॉस्टल में रैंडम टेस्टिंग हुई तो 229 छात्र और तीन कर्मचारी संक्रमित मिले। बेंगलुरू की एक सोसायटी में एक ही बिल्डिंग में 91 लोग संक्रमित मिले थे। कहने का आशय यह है कि जहां भी टेस्टिंग होगी वहां केसेज मिलेंगे। एक सौ लोगों का टेस्ट होगा तो पांच-छह संक्रमित जरूर मिलेंगे। तभी सरकार का टेस्ट कम करने का फैसला शुतुरमुर्ग के रेत में गर्दन गाड़ने जैसा है। कोरोना के केसेज नहीं दिख रहे हैं इसलिए कोरोना खत्म हो रहा है, यह मानना बहुत बड़ी गलतफहमी साबित होगी।

दुनिया के देशों ने इसे स्वीकार करना शुरू कर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्लुएचओ ने चेतावनी दी है कि दुनिया को इस साल कोरोना से छुटकारा नहीं मिलेगा। डब्लुएचओ के इमरजेंसी डायरेक्टर माइकल रेयान ने सोमवार को चेतावनी देते हुए कहा- यह सोचना गलत है कि इस साल दुनिया को कोरोना की लड़ाई में सफलता मिल जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले हफ्तों में दुनिया भर में कोरोना के मामले बढ़े हैं। इससे हमें सबक लेने की जरूरत है। डब्लुएचओ के महानिदेशक टेड्रोस गेब्रेसिएस ने भी कहा है कि पिछले हफ्ते यूरोप, अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में कोरोना के मामले बढ़े हैं।

ऐसा पिछले सात हफ्तों में पहली बार देखा गया है। उन्होंने इसे बहुत निराशाजनक बताया। डब्लुएचओ को लग रहा है कि कई देशों में सख्ती कम की गई है, जिससे लोग लापरवाही बरत रहे हैं और ऊपर से कोरोना के नए वैरिएंट आ गए हैं, जो तेजी से फैल रहे हैं। भारत में वैज्ञानिक व औद्योगिक शोध आयोग यानी सीएसआईआर के प्रमुख शेखर मांडे ने भी कोरोना की तीसरी लहर को लेकर आगाह किया है। उन्होंने कहा है कि कोविड-19 का संकट अभी खत्म नहीं हुआ है और अगर महामारी की तीसरी लहर आती है तो उसके बहुत गंभीर परिणाम होंगे।

सो, चाहे डब्लुएचओ हो या भारत का सीएसआईआर हो सबका मानना है कि कोरोना का संकट खत्म नहीं हुआ है और नई लहर आई तो उसके नतीजे ज्यादा गंभीर होंगे। फिर भी देश में केंद्र और राज्य सरकारों की रणनीति सिर्फ यह दिख रही है कि वैक्सीन लगा कर कोरोना को रोक दिया जाएगा। सरकारों को समझना होगा सिर्फ वैक्सीन लगा कर कोरोना को नहीं रोका जा सकता है। अमेरिका में पांच करोड़ से ज्यादा लोगों को टीका लग गया है और हर दिन 15 से 20 लाख लोगों को टीका लग रहा है फिर भी सबसे ज्यादा केसेज अमेरिका से आ रहे हैं, जबकि वहां व्यापक पैमाने पर टेस्टिंग भी चल रही है। भारत में वैक्सीन के भरोसे बैठे रहने से काम नहीं चलने वाला है। सरकारों को फिर से टेस्टिंग बढ़ानी होगी और यह ध्यान रखना होगा कि टेस्टिंग में वैसा घोटाला नहीं हो, जैसी बिहार में हुई है। इसके अलावा सरकार पूरी तरह से भले लॉकडाउन न लगाए लेकिन सब कुछ निर्बाध रूप से चालू कर देने की रणनीति भी ठीक नहीं है। लोगों को भी अभी पहले की तरह सावधानी बरतनी चाहिए। लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है।

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