कोरोना में चुनाव आयोग भी जिम्मेदार!


वैसे तो पिछले कुछ वर्षों में भारत की लगभग सभी संवैधानिक संस्थाओं और लोकतंत्र के कथित स्तंभों ने अपनी साख गंवाई है लेकिन जैसी अक्षमता और लापरवाही चुनाव आयोग के कामकाज में देखने को मिली है वह अभूतपूर्व है। इस समय अगर पूरा देश कोरोना वायरस की दूसरी लहर के भंवर में फंसा है तो कहीं न कहीं चुनाव आयोग भी इसके लिए जिम्मेदार है। अगर पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हिंसक और जहरीला हुआ है तो उसके लिए भी आयोग अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता है। अगर केंद्रीय सुरक्षा बलों की साख पर बट्टा लगा है और उनकी गोलीबारी में चार बेकसूर लोग मारे गए हैं तो उसके लिए भी चुनाव आयोग की जिम्मेदारी बनती है। अगर राज्य का प्रशासन पार्टी लाइन पर बंटा हुआ दिख रहा है या संघीय ढांचे पर चोट हुई है या चुनाव में धनबल का इस्तेमाल ऐतिहासिक ऊंचाई तक पहुंचा है तो चुनाव आयोग इसकी जिम्मेदारी से भी नहीं बच सकता है। अगर आज चुनाव आयोग पर यह आरोप लग रहा है कि वह भाजपा और केंद्र सरकार के कहे अनुसार काम कर रही है और विपक्षी पार्टियों के साथ भेदभाव कर रही है तो इसके लिए भी खुद आयोग जिम्मेदार है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और दूसरी कई विपक्षी पार्टियों ने आरोप लगाया है कि आयोग सरकार और सत्तारूढ़ भाजपा के हिसाब से काम कर रहा है। इन आरोपों पर आयोग अपनी सफाई में चाहे जो कहे पर हकीकत यह है कि उसने पश्चिम बंगाल में आठ चरण में चुनाव कराने का बेसिर-पैर का फैसला किया। उसने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव जल्दी से जल्दी निपटाने की कोई पहल नहीं की। चुनाव प्रचार में कोविड-19 के दिशा-निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिए उसने कोई एक ठोस कदम नहीं उठाया। उसकी आंखों के सामने चुनावी रैलियों में हजारों की भीड़ जुटती रही। बिना मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किए रैलियों और रोडशो में लोगों का हुजूम जुटता रहा।

इसका नतीजा यह हुआ कि चुनाव वाले राज्यों में कोरोना वायरस का विस्फोट हुआ। कह सकते हैं कि जिन राज्यों में चुनाव नहीं हुए वहां भी कोरोना की दूसरी लहर आई है पर यह बात सिर्फ तर्क के लिए ठीक है क्योंकि जिन राज्यों में चुनाव हुए वहां कोरोना काफी हद तक काबू में था। केरल, तमिलनाडु, पुड्डुचेरी, पश्चिम बंगाल और असम में कोरोना लगभग पूरी तरह से नियंत्रण में था। असम में तो अब भी छह से सात सौ केसेज ही आए हैं और लेकिन यह तेजी से बढ़  रहा है, जिसके लिए तीन चरण में हुआ चुनाव भी जिम्मेदार है। पश्चिम बंगाल में 26 फरवरी को चुनाव की घोषणा के बाद से कोरोना वायरस के संक्रमण में 26 सौ फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है। केरल में जहां केसेज दो हजार से नीचे आ गए थे वहां संक्रमितों की संख्या 20 हजार तक पहुंची है। यहीं स्थिति तमिलनाडु और पुड्डुचेरी की है।

इतना ही नहीं चुनाव आयोग ने 10 राज्यों में 13 विधानसभा सीटों और दो लोकसभा सीटों के उपचुनाव की भी घोषणा की और हर सीट जीतने के लिए जान दांव पर लगा देने वाले नेताओं ने उपचुनावों में भी जम पर प्रचार किया। जिन राज्यों ने अपने यहां लॉकडाउन या कर्फ्यू लगाए उन्होंने भी उप चुनाव के क्षेत्र को उससे बाहर रखा। उसका नतीजा भी सबके सामने है। मध्य प्रदेश में तो मुख्यमंत्री के सुपुत्र ही दमोह सीट पर उपचुनाव के प्रचार के दौरान संक्रमित हो गए। कर्नाटक के उपचुनाव में जोर लगा रहे मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा दोबारा कोरोना संक्रमित हो गए हैं। तभी सवाल है कि क्या चुनाव आयोग कोरोना वायरस के संक्रमण की दूसरी लहर को दूर-दराज तक पहुंचाने और करोड़ों लोगों के जीवन को खतरे में डालने की अपनी जिम्मेदारी से बच सकता हैअगर आयोग के किसी भी आयुक्त या अधिकारी में जरा सी भी दूरदृष्टि होती या सरकार के दबाव के आगे तन कर खड़े होने की हिम्मत होती तो अब तक चुनाव कब का खत्म हो गया होता और तब शायद प्रधानमंत्री और दूसरे केंद्रीय मंत्री कोरोना को काबू में करने के गंभीर प्रयास में जुटे होते!

ध्यान रहे चुनाव आयोग ने पिछले साल बिहार का चुनाव कराया था और पिछले चुनाव के मुकाबले मतदान का एक चरण कम कर दिया था। इसके उलट पश्चिम बंगाल में उसने एक चरण बढ़ा दिया। कायदे से बाकी राज्यों के साथ ही पश्चिम बंगाल का चुनाव दो या तीन चरण में कराया जा सकता था। जब चुनाव आयोग पूरे देश में लोकसभा चुनाव और उसके साथ साथ कई राज्यों के विधानसभा चुनाव भी एक साथ करा लेता है तो पांच राज्यों के चुनाव कम चरणों में कराना कोई बड़ी बात नहीं है। कम चरण में चुनाव कराने के कई फायदे हैं। पहला फायदा तो यह होता कि कोरोना वायरस का विस्फोट होने से पहले चुनाव पूरे हो जाते। कम चरण में चुनाव कराने का पारंपरिक रूप से एक फायदा यह होता है कि हिंसा कम होती है। अगर ज्यादा चरण में चुनाव होता है तो हर चरण के बाद तापमान बढ़ता जाता है, नेताओं के भाषण भड़काऊ होते जाते हैं, पार्टियों के कार्यकर्ताओं और गुंडों को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाने का समय मिलता है और आम जनता भी भावना के प्रवाह में बहती है। कम चरण में चुनाव करा कर इन सबको रोका जा सकता था। लेकिन ऐसा लग रहा है कि या तो आयोग ने दूरदर्शिता से काम नहीं लिया या केंद्र सरकार के दबाव के आगे झुक गई। ध्यान रहे बंगाल में आठ चरण में चुनाव कराने का फायदा अगर किसी को होता है तो वह भाजपा है, जिसने अपने प्रचार तंत्र की ताकत और बेहिसाब खर्च से चुनाव को अलग ही स्तर पर पहुंचा दिया है।

चुनाव आयोग ने न सिर्फ आठ चरण में पश्चिम बंगाल का मतदान रखा, बल्कि जाने-अनजाने में हर चरण में मतदान क्षेत्रों का चयन इस तरह से किया, जिससे भाजपा को फायदा और तृणमूल कांग्रेस को नुकसान हो। हर चरण के लिए मतदान क्षेत्रों का चयन बेसिर-पैर का था। एक ही जिले में कई चरणों में मतदान हुए। शुरुआती चरणों में भाजपा के असर वाले इलाकों में मतदान कराया गया, जिससे भाजपा को आगे के चरणों में हवा बनाने का मौका मिला। इसके बाद भी तृणमूल कांग्रेस ने आखिरी तीन चरण के मतदान एक साथ करा लेने की अपील की तो चुनाव आयोग ने उसे खारिज कर दिया क्योंकि भाजपा ऐसा नहीं चाहती थी। अनेक मतदान केंद्रों पर सुरक्षा बलों की तैनाती में भी खामियां दिखीं। आमतौर पर केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती मतदान केंद्रों से बाहर होती है लेकिन जिन इलाकों में हिंसा हुई वहां सुरक्षा बलों की तैनाती मतदान केंद्र के अंदर दिखी और बाहर कोई सुरक्षाकर्मी नहीं था। सो, चाहे आठ चरण में मतदान कराने की बात हो, हर चरण के लिए मतदान क्षेत्रों का चयन हो, आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई का मामला हो, प्रचार का समय घटाने या प्रचार बंद करने का समय बढ़ा कर 72 घंटे करने का फैसला हो या सुरक्षा बलों की तैनाती का मामला हो हर जगह किसी न किसी स्तर का पक्षपात दिखा।

पांच राज्यों के चुनाव में खबरों के मुताबिक चुनाव आयोग ने एक हजार करोड़ रुपए की नकदी या सामान जब्त किए, जिनका इस्तेमाल चुनाव में होना था। सोचें, जब एक हजार करोड़ रुपए की जब्ती हुई है तो इससे कितना गुना ज्यादा पैसा चुनाव में खर्च हुआ होगा? क्या इसे चुनाव आयोग की कामयाबी कहेंगे? चुनाव आयोग चुनावों में धनबल के इस्तेमाल को रत्ती भर भी कम नहीं कर पाया है, उलटे हर चुनाव के साथ पार्टियों और नेताओं का खर्च बढ़ता गया है, जिसका नतीजा है कि चुनाव अब सभी पार्टियों के लिए एकसमान मैदान वाला नहीं रह गया है। केंद्रीय चुनाव आयोग चुनावी चंदे के इलेक्टोरल बांड जैसी अपारदर्शी व्यवस्था को लागू होने से नहीं रोक सका और न नकद चंदे पर रोक लगा सका। यह तथ्य है कि भाजपा जैसी दुनिया की कथित सबसे बड़ी पार्टी हो या कांग्रेस हो या दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों हों, सबका 90 फीसदी से ज्यादा चंदा नकद आता है और इसमें से 95 फीसदी चंदे के स्रोत का पता नहीं होता है।

source link

close