इलाज का प्रोटोकॉल बनाए सरकार

 


भारत में कोरोना वायरस की महामारी के खिलाफ जिस अंदाज में जंग लड़ी जा रही है वह दुनिया में सबसे अनोखी है। इस जंग की सबसे अनोखी बात यह है कि किसी को पता नहीं है इससे कैसे लड़ा जा रहा है। सेनापति कौन है, जंग की रणनीति क्या है, अस्त्र-शस्त्र कौन से हैं यह किसी को पता नहीं है। जिन लोगों पर इस जंग में निर्णायक भूमिका निभाने की जिम्मेदारी है वे सब लोग जो मन में आता है वह टेलीविजन पर आकर बोल जाते हैं। लोग उसके हिसाब से काम करना शुरू करते हैं तब तक दूसरे सज्जन आकर दूसरी बात बता जाते हैं। कोरोना के सरकारी विशेषज्ञों और देश के बड़े अस्पतालों के विशेषज्ञ डॉक्टरों से लेकर व्हाट्सएप मेडिकल कॉलेज के प्राध्यापकों और छात्रों ने ऐसा कंफ्यूजन पैदा किया है कि भारत की जंग कहीं भी पहुंचती नहीं दिख रही है। भारत दुनिया का संभवतः इकलौता देश है, जहां महामारी शुरू होने के एक साल बाद भी इलाज का प्रोटोकॉल तय नहीं है। कोरोना टेस्टिंग से लेकर दूसरी जांच और बेसिक इलाज से लेकर क्रिटिकल केयर तक का कोई प्रोटोकॉल नहीं बना है। जिस अस्पताल और जिस डॉक्टर को जैसे मर्जी हो रही है वह वैसे इलाज कर रहा है। इसका सबसे बड़ा शिकार वो मरीज हैं, जो होम आइसोलेशन में रह कर अपना इलाज करा रहे हैं। उनको पता नहीं चल पा रहा है कि कौन सा टेस्ट कराना है, कौन सा नहीं कराना है और कौन सी दवा खानी है, कौन सी नहीं खानी है।

असल में यह स्थिति इसलिए है क्योंकि सरकार और कोरोना से जंग का नेतृत्व कर रहे सरकारी विशेषज्ञों को खुद ही पता नहीं है कि वे क्या कर रहे हैं। सबसे ज्यादा खतरनाक बात यह है कि सरकारी विशेषज्ञ जांच और इलाज के संसाधनों की उपलब्धता के हिसाब से इलाज का तरीका तय कर रहे हैं। जो सामान उपलब्ध है उसका जम कर इस्तेमाल हो रहा है और जैसे ही उस सामान की किल्लत हो रही है वैसे ही कहा जाने लग रहा है कि यह इलाज के लिए जरूरी नहीं है। जैसे पहले रेमडेसिविर को कोरोना मरीजों के लिए जीवनरक्षक बताया गया। इसे रामबाण इलाज मान कर डॉक्टरों ने इसका इस्तेमाल किया। लेकिन जैसे ही मरीजों की संख्या बढ़ी और दवा की किल्लत हुई वैसे ही सरकारी विशेषज्ञों ने सामने आकर कहा कि यह जीवनरक्षक दवा नहीं है, इसका इस्तेमाल घर पर नहीं किया जा सकता है, अस्पताल में भर्ती मरीजों को ही डॉक्टर की सलाह पर यह इंजेक्शन लगेगा आदि आदि।

सवाल है कि यह बात पहले क्यों नहीं कही गई? क्यों नहीं इसके इस्तेमाल का प्रोटोकॉल बनाया गया? और आगे क्या जब इसका उपलब्धता सुनिश्चित हो जाएगी क्या तब भी ये ही प्रोटोकॉल रहेगा या तब घरों में लोग इसका इस्तेमाल कर सकेंगे? अगर सरकार ने पहले ही यह बात कही होती तो लाखों मरीजों के परिजनों को परेशान नहीं होना होता और उनके पैसे भी बचते। पता नहीं सरकार यह बात जानती है या नहीं कि कितने लोगों ने कितनी मुश्किलों से पैसे और इस दवा का इंतजाम किया!

ऐसे ही कोरोना वायरस की पहली लहर शुरू होने के समय कहा गया कि चेस्ट का सीटी स्कैन फेफड़ों को बचाने का सबसे जरूरी तरीका है। डॉक्टरों ने ही कहा कि समय रहते सीटी स्कैन करा कर इलाज नहीं होगा तो फेफड़े खराब हो जाएंगे। फैब्रोसिस जैसे गंभीर मेडिकल टर्म के बारे में लोग इसलिए जान गए क्योंकि डॉक्टरों ने कहा कि सीटी स्कैन से इसकी पहचान हो सकती है और समय से इलाज हो सकता है। लेकिन दूसरी लहर में जैसे ही मरीजों की संख्या बढ़ी और सीटी स्कैन करने वाले सेंटर्स के सामने लोगों की भीड़ लगी और कई-कई दिन की वेटिंग होने लगी तो अचानक सरकारी विशेषज्ञ, एम्स के निदेशक डॉक्टर रणदीप गुलेरिया सामने आए और कहा कि लोगों को सीटी स्कैन कराने से बचना चाहिए, उसकी बजाय एक्सरे कराना चाहिए।

उन्होंने लोगों को डराते हुए कहा कि एक सीटी स्कैन तीन सौ बार एक्सरे कराने की तरह है और ज्यादा सीटी स्कैन कराने से कैंसर हो सकता है। सोचें, अगर ऐसा है तो लोगों को पहले ही इसके बारे में क्यों नहीं आगाह किया गया? जो लोग पहली लहर से अभी तक कई बार स्कैन करा चुके उनका क्या होगा? उनके पैसे भी गए और सेहत के लिए नया संकट अलग खड़ा हुआ!

इसी किस्म की अव्यवस्था स्टेरॉयड के इस्तेमाल को लेकर है। कोरोना का मरीज देखते ही डॉक्टर सीटी स्कैन कराने को बोलते और रिपोर्ट आते ही माइल्ड इंफेक्शन वालों को भी स्टेरॉयड शुरू करा देते थे। लाखों मरीजों को बिना जरूरत के स्टेरॉयड दिया गया, जिसका नतीजा यह हुआ कि ओवर द काउंटर बिकने वाला स्टेरॉयड बाजार से गायब हो गया। उसकी कालाबाजारी होने लगी। दूसरी ओर जिन लोगों को स्टेरॉयड दिया गया उनमें से किसी का शुगर बढ़ रहा है तो किसी का रक्तचाप ऊपर नीचे हो रहा है तो किसी का वजन बढ़ रहा है। उनका शरीर कई दूसरे किस्म के संक्रमण की मार झेलने के लिहाज से कमजोर हो गया सो अलग। अब कहा जा रहा है कि माइल्ड इंफेक्शन या मॉडरेट इंफेक्शन वालों को स्टेरॉयड लेने की जरूरत नहीं है।

कोरोना वायरस के मरीजों के लिए ऑक्सीजन की प्राथमिकता देश के डॉक्टरों ने ही बनाई है। उन्होंने सांस की जरा सी तकलीफ पर लोगों को ऑक्सीजन लगाना शुरू कर दिया। इसकी देखा-देखी लोगों ने ऑक्सीजन सिलेंडर खरीद कर घरों में जमा करना शुरू कर दिया। पूरे देश में ऑक्सीजन सिलेंडर की ऐसी कालाबाजारी हो रही है, जिसकी मिसाल नहीं है। अस्पतालों तक में ऑक्सीजन की कमी हो गई है। जब ऑक्सीजन के लिए हाहाकार मचा तो सरकारी विशेषज्ञ घर बैठे बिना सिलेंडर के शरीर में ऑक्सीजन बढ़ाने के उपाय बताने लगे। यह भी कहा जाने लगा कि सभी मरीजों को ऑक्सीजन की जरूरत नहीं है। पहले कहा गया कि ऑक्सीजन सैचुरेशन 94 से कम हुआ तो अस्पताल जाना होगा अब डॉक्टर समझाने लगे हैं कि 90 तक सैचुरेशन भी गंभीर नहीं है। उससे कम होने पर अस्पताल जाने की या ऑक्सीजन लेने की जरूरत होगी। क्या इस बेसिक बात में भी एकरूपता नहीं होनी चाहिए?

पहले दिन से कहा जा रहा है कि टेस्टिंग, ट्रेसिंग और ट्रीटमेंट ये तीन ही उपाय हैं, जिनसे कोरोना का प्रसार रोका जा सकता है। सबसे ज्यादा जोर टेस्टिंग पर दिया जा रहा था। अब जबकि टेस्टिंग किट्स खत्म हो गए हैं या आउटडेटेट हो गए हैं और लैब्स की क्षमता चूक गई है तो उस पर से फोकस हटा दिया गया है। हर जगह टेस्टिंग कम होने लगी है। एक सरकारी विशेषज्ञ ने टेलीविजन पर आकर कहा कि अब ज्यादा टेस्टिंग करने से कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि उससे सिर्फ संख्या बढ़ेगी। अब टेस्टिंग की बजाय इलाज पर ध्यान देना होगा। इसी बीच कोरोना से लड़ रही भारत सरकार की नोडल एजेंसी इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च यानी आईसीएमआर ने कहा है कि अब घरेलू यात्रा करने के लिए आरटी-पीसीआर टेस्ट की निगेटिव रिपोर्ट अनिवार्य नहीं होगी। गौरतलब है कि कई राज्यों ने अपने यहां आने वालों के लिए यह टेस्ट अनिवार्य किया हुआ है। लेकिन चूंकि अब टेस्ट ज्यादा नहीं हो रहे हैं या उसमें देरी हो रही है, जिससे व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो आईसीएमआर ने टेस्ट घटाने का यह तरीका निकाल लिया।

सो, चाहे टेस्टिंग का मामला हो, बेसिक इलाज के लिए ऑक्सीजन की जरूरत का मामला हो, क्रिटिकल केयर के लिए रेमडेसिविर या स्टेरॉयड जैसी दवा की जरूरत हो या सीटी स्कैन कराने की जरूरत हो या यहां तक कि साधारण फैबिफ्लू जैसी दवा के इस्तेमाल का मामला हो, हर मामले में भारत में कंफ्यूजन है। इसलिए सरकार को इलाज का एक प्रोटोकॉल बनाना चाहिए, जिसके मुताबिक ही सभी अस्पतालों में या होम आइसोलेशन में इलाज हो। यह नहीं होना चाहिए कि जिस दवा या चिकित्सा उपकरण की कमी होने लगे उसे इलाज के प्रोटोकॉल से हटा दें और जो उपलब्ध हैं, उसी से इलाज हो!

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