तालिबान से भारत सरकार सीधा संवाद क्यों नहीं करती ?


डॉ. वेदप्रताप वैदिक

अफगानिस्तान में अशरफ गनी सरकार गिर चुकी है लेकिन तालिबान की सरकार ने अभी तक औपचारिक सत्ता-ग्रहण नहीं किया है। किसी भी देश में जब भी तख्ता-पलट होता है तो नए शासक की घोषणा तुरंत होती है लेकिन ऐसा लगता है कि तालिबान अभी सलाह-मशवरा में मशगूल हैं। पहले तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ होगा कि अशरफ गनी की साढ़े तीन लाख की फौज बिना लड़े ही हथियार डाल देगी।
तालिबान को क्या, अमेरिकियों को भी इल्म नहीं था कि अफगान-सेना इतनी जल्दी धराशायी हो जाएगी। अमेरिका का जासूसी—तंत्र दुनिया का सबसे बड़ा और सक्षम तंत्र है लेकिन राष्ट्रपति जो बाइडन भी बिल्कुल गलत सिद्ध हो गए। और भारत का तो कहना ही क्या ? वह दक्षिण एशिया का सबसे शक्तिशाली देश है। उसका प्रधानमंत्री कार्यालय, उसका विदेश मंत्रालय और उसका गुप्तचर विभाग टापता रह गया। उसे पता ही नहीं चला कि काबुल सूखे पत्ते की तरह टूट कर तालिबान के हाथ में गिरने ही वाला है। सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष के नाते भारत चाहता तो काबुल में संयुक्तराष्ट्र की शांति—सेना भिजवा सकता था लेकिन यह मौका उसने खो दिया। यह मौका तो अभी भी है।
भास्कर में पिछले हफ्ते ही मैंने लिखा था कि तालिबान मूलतः पश्तूनों का संगठन है। अगर उसने हेरात और मजारे-शरीफ— जैसे गैर-पश्तून इलाके इतनी आसानी से कब्जा लिये तो कंधार, काबुल और जलालाबाद— जैसे पश्तून इलाके तो अपने आप उसकी शरण में आ जाएंगे लेकिन भारत सरकार ने कोई चतुराई नहीं दिखाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 अगस्त को जब लाल किले से भाषण दे रहे थे, उस समय तालिबान काबुल के राजमहल में घुस रहे थे लेकिन उनके भाषण में इसकी ज़रा भी कोई चिंता नहीं दिखी।
अफगानिस्तान में जो भी उथल-पुथल होती है, उसका सबसे ज्यादा असर पहले पाकिस्तान और फिर भारत पर होता है लेकिन आप जरा देखें कि अफगान-संकट में सबसे सक्रिय भूमिका कौनसे देश अदा कर रहे थे? अमेरिका, चीन, रूस, तुर्की, क़तर, यूएई और ईरान आदि! अफगान मुजाहिदीन और तालिबान ने रूस और अमेरिका के हजारों जवानों को मौत के घाट उतार दिया और उनके अरबों-खरबों डाॅलरों पर पानी फेर दिया लेकिन इसके बावजूद वे उनके साथ पिछले दो साल से खुलकर बात कर रहे हैं लेकिन भारत आज क्या कर रहा है ? भारत ने अपना दूतावास खाली कर दिया है। अपने राजदूत और अन्य राजनयिकों की जान बचाकर उन्हें किसी तरह भारत ले आया गया है। अभी भी भारत के लगभग डेढ़ हजार नागरिक वहाँ फंसे हुए हैं।
क्या वजह है कि अमेरिका, रूस, चीन, ईरान और तुर्की जैसे देशों ने काबुल में भारत की तरह अपने दूतावास खाली नहीं किए हैं ? क्या वजह है कि रूस, चीन और ईरान ने घोषणा कर दी है कि वे तालिबान के साथ सहयोग करेंगे ? और क्या वजह है कि भारत की बोलती बंद है? भारत सरकार का प्रवक्ता सिर्फ प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा के बारे में चिंतित दिखाई पड़ रहा है? यह ठीक है कि अफगानिस्तान में फंसे भारतीयों को निकाल लाने में भारत सरकार मुस्तैदी दिखा रही है लेकिन क्या वह इस अफगान-संकट में भारतीय राष्ट्रहितों की रक्षा करने का पर्याप्त प्रयत्न कर सकी है?
रूस और अमेरिका ने चाहे अफगानिस्तान में अरबों-खरबों रुपए बहा दिए लेकिन आम अफगान जनता में भारत की जो सराहना है, वह इन देशों की नहीं है। भारत खुद मालदार देश नहीं है लेकिन अफगानिस्तान के नव-निर्माण में भारत ने तीन बिलियन डाॅलर लगाए हैं। उसके दर्जनों नागरिकों और राजनयिकों को आतंकवादियों ने अपना निशाना बनाया है। भारत ने 200 कि.मी. की जरंज-दिलाराम सड़क बनाकर अफगानिस्तान को फारस की खाड़ी तक जाने का वैकल्पिक मार्ग दिलवा दिया है। पाकिस्तान पर उसकी निर्भरता को ऐच्छिक बना दिया है। यह ठीक है कि हामिद करजई और अशरफ गनी सरकारों के साथ भारत के संबंध घनिष्ट रहे लेकिन वे खुद तालिबान के साथ खुलकर बात करती रहीं तो भारत सरकार को किसने रोका था ? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी सरकार अमेरिका के भरोसे रह गई ?
तालिबान को हम अछूत मानते रहे, क्योंकि वे पाकिस्तान के हमजोली रहे हैं लेकिन हम क्यों भूलते हैं कि तालिबान भारत के दुश्मन नहीं हैं। दिसंबर 1999 में जब हमारे अपहत जहाज को कंधार ले जाया गया, तब उसे छुड़वाने में तालिबान के सर्वोच्च नेता मुल्ला उमर ने ही हमारी मदद की थी। प्रधानमंत्री अटलजी के कहने पर पीर गैलानी से मैं लंदन में मिला, वाशिंगटन स्थित ‘तालिबानी राजदूत’ अब्दुल हकीम मुजाहिद और कंधार में मुल्ला उमर से मैंने सीधा संपर्क किया और हमारा जहाज मुक्त हो गया। अब भी तालिबान प्रवक्ता ने कहा है कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है। उसने यह भी कहा है कि अफगानिस्तान में तीन बिलियन डाॅलर का निर्माण-कार्य करने के लिए वह भारत की सराहना करता है।
इसके अलावा तालिबान ने अभी तक जो घोषणाएं की हैं, उनसे ऐसा लगता है कि पिछले 25 साल में उन्होंने कई सबक सीखे हैं। वे पहले से अधिक परिपक्व और उदार हो गए हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो क्या अभी तक करजई और अब्दुल्ला-जैसे नेताओं की जान को खतरा नहीं हो जाता ? तालिबान ने अफगान महिलाओं से सरकार में हिस्सेदारी की अपील की है। उसने सर्वसमावेशी सरकार चलाने की घोषणा की है। अभी तक भयंकर खून-खराबे की कोई गंभीर खबर नहीं है। कोई आश्चर्य नहीं कि तालिबान काबुल में अब कोई मिली-जुली सरकार चलाने के लिए तैयार हो जाएं।
जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, वह भी तालिबान की विजय से बाग-बाग है लेकिन वह डरा हुआ भी है। तालिबान नेता मुल्ला बिरादर पाकिस्तानी जेलों में आठ साल काट चुके हैं। तालिबान के भी कई खुदमुख्तार गुट हैं। उनमें से कुछ डूरेंड लाइन को अवैध मानते हैं और पठानों का राज पेशावर तक चाहते हैं। इस समय इस्लामाबाद में गैर-तालिबान नेताओं का एक दल काबुल में संयुक्त सरकार बनाने की कवायद भी कर रहा है। यदि इस मौके पर अमेरिका और चीन, जो एक-दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं, उनके विदेश मंत्री भी एक-दूसरे से बात कर रहे हैं तो भारत अपनी दुम दबाए क्यों बैठा हुआ है? भारत चाहे तो तालिबान से सीधा संवाद करके उन्हें लोकतांत्रिक मार्ग पर चलने के लिए भी प्रेरित कर सकता है।
(लेखक, अफगान-मामलों के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने अफगान विदेश नीति पर जनेवि से पीएच.डी. किया है और वे पिछले 56 साल से अफगान नेताओं के संपर्क में हैं।)
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